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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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१० अ० १ पा० १ ख० १ । इस प्रकारकी व्युत्पत्ति होती है, इत्यादि बातें कही गई हैं, किन्तु समाम्नाय शब्दके अर्थतत्वका विवेचन नहीं हुआ जैसा कि शास्त्रीय रीतिसे होना चाहिये, इस लिये अब विशेष रूप से समाम्नायार्थ निरूपण कियाजाता है ।— “तद्यान्येतानि चत्वारि.पद-जातानि नामाख्याते चोपसर्गनिपाताश्च” [ नि० १ अ० १ पा० १ खं ] वही समाम्नाव या निघण्टु पदार्थ है, जो ये चार पद समूह हैं, वे ये ही चार पद समूह है, जोकि—नाम, आख्यात, उप- सर्ग और निपात हैं। यह बात पहिले कही गई है कि गोआदि देवपत्नी पर्यन्त शब्दसमूह निघण्टु नामसे बोला जाता है, वह भी यावत् शब्दसमूहका उपलक्षण समझना चाहिये । निरुक्त शास्त्रके मतमें शब्दमात्र कुल चार भागोंमें बटे हुए हैं, जैसे कि नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात । अर्थात् नैरूक्तोंके मतमें इस प्रकार चार पद होते है, इससे अल्प या अधिक नहीं । अन्य आचार्यों के मतमें पदविभाग । (१) इन्द्र एक महावैयाकरण हुए हैं, उनके मतमें “अर्थः पदम्” अर्थही पद है । प्रयोजन यह है कि-सब शब्दोंमें अर्थत्व रूपसे अर्थ एक ही है, उसमें भेद नहीं। अर्थात् उक्त महावैयाकरण अर्थबोधक सब शब्दोंको एक जातीय ही मानता है, किन्तु शब्द में अवान्तर अनेक जातियां नहीं स्वीकार करता, इसलिये उस के मतमें एक ही पद है और अर्थ ही उसका लक्षण है ।

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