निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextहिन्दीनिरुक्त । ११३ व्याकरणकी रीतिसे स्वर, संस्कार तथा धातुकी, कल्पना नहीं हो सकती, इससे “सब शब्द आख्यातज नहीं।” किन्तु हम कहते हैं कि-“सभी नाम क्रियासे उत्पन्न हैं" इससे तुमने जो हमें उपालम्भ दिया है, अयुक्त है। प्रयोजन यह है कि- नामोंमें क्रियावाचक धातुओंकी कल्पना करके जहां तक गम्य हो उनके आधार पर स्वर तथा संस्कारोंका अनुशासन करना चाहिए। क्योंकि-लक्षणों (व्याकरणके नियमों) की गति व्यापक है, यह शब्दका अपराध नहीं और न हमारा ही है, किन्तु यह आपकी मन्द शिक्षाका अपराध है, जिसके कारण विद्यमान भी स्वर- संस्कारोंको क्रियावाचक धातुमें तुम अनुविधान नहीं कर सकते, इससे तुम फिर व्याकरण पढ़ो, जबतक तुम्हें अनुविधानकी शक्ति हो । भाव यह है कि-व्याकरणोंमें धातु, पाठमात्रसे ही पूरे नहीं किये हैं, किन्तु उनके अतिरिक्त अन्य बहुत धातु हैं, जिनमें कोई सौत्र या सूत्रपठित, कोई तु, च, वा शब्दोंसे ज्ञातव्य, कोई अध्या- हारसे गम्य एवम् कोई पठित धातुओंके विभागसे जानने योग्य हैं। भिन्न भिन्न व्याकरणके अविरोध स्थलोंमें जो कोई विधि किसी व्याकरण हीमें कही है। ये सभी बातें शब्दके प्रयोग करनेवालेको प्रयोगकालमें उपसंहार या समेटना चाहिये। इसी रीतिसे यहांपर सभी लक्षणोंकी सब संस्कारोंकी सिद्धिके लिये अपेक्षा करनी होगी। अतः हे गार्ग्य ! तुम फिर शिक्षाका लाभ करो, जबतक तुम्हें सब शब्दोंके अखिल संस्कारोंके अनुविधानकी शक्ति हो । २रे प्रश्नका उत्तर। तुम भी देखते हो और हम भी देखते हैं,--कि समान कर्मके करनेवालोंमें कोई उस क्रियावाले नामसे बोले जाते हैं, और कोई नहीं। जैसे-तक्षा, परिव्राजक, जीवन, भूमिज । कोई मनुष्य तक्षण (लकड़ीका छोलना) क्रियासे