निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context३२२ अ० १ पा० ५ ख० १ । 'सुवरचा अनुष्मात्राः पानीयम्'- इति । यथौ एतत्-अविस्पष्टार्था भवन्ति' इति । नैष स्थाणोरप- राधः, यदेन मन्धो न पश्यति, पुरुषापराधः स भवति । यथा जानपदीषु विद्यातः पुरुषविशेषो भवति, पारो वर्यवित्सु तु खलु वेदितृषु भूयोविद्यः प्रशस्यो भवति ॥ २ ॥ इति प्रथमाध्यायस्य पञ्चमः पादः ॥ १, ५ ॥ पञ्चमः पादः । निरुक्तका प्रयोजनान्तर । ( व्याकरण और निरुक्त ) इस प्रकारसे आरम्भसे चतुर्थपाद-पर्य्यन्त विभागसे अवस्थित जो नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात उनका लक्षण सामान्य व विशेषरूपसे निरूपण किया गया । यह पदज्ञानरूप, निरुक्त शास्त्रका पहिला प्रयोजन है, उसी प्रकार पदार्थज्ञान भी दूसरा प्रयोजन है। अर्थात् जिस प्रकार पदज्ञानके विना मन्त्रोंमें अर्थ की प्रतीति नहीं हो सकती, उसी प्रकार पदार्थज्ञानके विना भी नहीं। इसीलिये शास्त्रारम्भके द्वितीय प्रयोजनको दिखानेके अर्थ यहांसे आरम्भ होता है। भाव यह है कि—इस निरुक्त शास्त्रके बिना लोक तथा वेदमें पृथक् पृथक् पद रूपसे एवम् मन्त्रोंमें वाक्यरूपसे रहते हुए नाम आदिकोंके ज्ञान हो जाने पर भी वहां जो उनका समस्त मिलित अर्थ है, जिसको जानकर