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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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Page 124

हिन्दी निरुक्त । १२५ यह प्रश्न, कि—गुणादिके समान अङ्गभूत है ? यह भी ठीक नहीं, क्योंकि—व्याकरणका अङ्ग होता, तो जैसे "उणादयो बहुलम्" यह सूत्र उणादि शब्दोंका संग्रह करता है; उसी प्रकार “निघण्टवो बहुलम्” ऐसा सूत्र बनाकर पाणिनि मुनि इस शास्त्रका भी संग्रह कर देते, किन्तु ऐसा नहीं किया, इससे यह शास्त्र व्याकरणका अङ्ग नहीं है। इसलिये "यह शास्त्र अर्थके निर्वचनमें स्वतन्त्र है, व्याकरण तो केवल लक्षण प्रधान है" यह दोनोंका विशेष या भेद है। लक्षण नाम प्रकृति-प्रत्यय आदिका है, यह सब शब्द तक गति रखते हैं। कौत्सके मतसे निरुक्तकी अनर्थकता । कौत्स ऋषि कहते हैं कि—“यदि मन्त्रोंके अर्थज्ञानके लिये निरुक्त शास्त्रका आरम्भ किया जाता है, तो अनर्थक ही है, क्योंकि—मन्त्रोंका वाच्य वाचक भाव—सम्बन्धसे कोई अर्थ नहीं है। इस लिये निरुक्त शास्त्रका आरम्भ नहीं करना चाहिये । किन्तु निरुक्त शास्त्रके पढ़नेवालोंको उनके ऐसे कथन पर ध्यान न देना चाहिये, प्रत्युत—वेद और शास्त्रोंको देखकर बातको व्यवस्थित करना चाहिये कि—वे सत्य कहते हैं या वृथा ? अथवा जिन हेतुओंको अब हम दिखायेंगे, उनको समझकर मन्त्रोंका अर्थवत्व देखना चाहिये । कौत्सके मतमें मन्त्रोंके अनर्थक होनेमें युक्तियां । ( १ ) मन्त्रोंमें जो शब्द पढ़े हुए हैं, पर्याय शब्द बदल कर नहीं पढ़े जाते, तथा जो शब्द पूर्व पढ़ा है, वह उत्तर नहीं पढ़ा जाता । जैसे कि—लोकमें "गामानय" गौकोलेआ ऐसाभी कहते हैं; और गो शब्दके पर्याय धेनु शब्दको लेकर “धेनुमानय" भी कहते हैं । किन्तु वेदमें 'अग्न आयाहि" ( सा० सं० १, १, १, . १ ) इस वाक्यके स्थानमें 'विभावसो ! आगच्छ' इत्यादि वाक्य