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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

Page 143 of 1282

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Page 143

१४४ अ० १ पा० ६ ख० १ । दूसरा उदाहरण— "अव॑सायाश्वा॒न्" (ऋ० सं० १, ७, १८, १) एतया॑ नि॒ष्टुभा कुत्स आङ्गिरस इन्द्रं॑ तुष्टाव । कुत्स आङ्गिरस इन्द्रकी स्तुति करता है कि—हे इन्द्र ! तुम्हारे बैठनेके लिये मैंने जो यह स्थान किया है, तू उस पर आकर निश्चय ही बैठ, अर्थात् जिस प्रकार रस्सियोंसे बंधा तथा शब्द करता हुआ घोड़ा अपने स्थानमें स्थित होता है, उसी प्रकार मेरी स्तुतियोंसे हर्ष शब्दोंको करते हुए मेरे बिछाये हुए कुशरूप आसन पर तू दिन और रात्रिमें चलनेवालोंसे अधिक चलनेवाले अपने घोड़ोंको रथसे अलग कर रस्सियोंसे मुक्त कर, तथा उन्हें चारा देकर, अनन्तर स्वस्थ वा निश्चिन्त होकर बैठ। किन्तु तुम्हारे इस यजनकालमें हमारे लिये विघ्न उपस्थित न कर । उक्त दोनों ही ऋचाओंमें “अवसाय" पद आता है, किन्तु पदकार पहिली ऋचामें इसको अन्नके पर्याय अदन्त अवस नामका चतुर्थ्यन्त पद समझ कर बिना अवग्रह किये पढ़ते हैं। तथा दूसरी ऋचामें 'अव' उपसर्ग 'षो' अन्तकर्मणि धातु और 'क्त्वा' प्रत्ययका समस्त पद समझकर 'अव ३ साय' ऐसा अवग्रह पूर्वक पढ़ते हैं। भाव यह है कि-वेदके संहिता पाठके समान मन्त्रोंका एक पद पाठ भी है, जिसमें ऋषियोंने मन्त्रोंके अर्थको सुखपूर्वक जानने एवम् उसके अन्यथा न होनेके लिये आनुपूर्वीसे मन्त्रगत सब पद १—"योनिष्ट इन्द्र निषदे अकारितमा निषीद् स्वानोनावौ । विमुच्यावयोऽवसायाश्वान् दोषा वस्तोर्वहीयसः प्रपित्वे ॥" (ऋ० सं० १, ७, १८, १)