निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in contextहिन्दी निरुक्त । ५
वान् लोग घोड़े या बैलके चुभानेके लिये किसी पतली लाठीमें लगाये रखते हैं। जो घोड़ा या बैल अपने ऊपर आरके आनेसे पहिले ही गाड़ी- वान्के अभिप्रायको जानकर पहिले ही चल पड़ता है, वो 'उद्ग- तार', अर्थात् जिससे सदा ही आर दूर रहता है, उस घोड़े या बैलमें, इस शब्दकी उचित वृत्ति है, किन्तु यह अपने उस उचित अर्थ को छोड़कर केवल 'अभिप्रायके अनुसार करने' को निमित्त बनाकर ही सर्वत्र प्रवृत्त हो जाता है। जो कोई किसीको, — उसके अभिप्रायको — जानकर ही, उसके मांगनेसे पहिले ही, दे देता है, वह 'उदार' नामसे बोला जाता है। ऐसे ही 'निस्त्रिंश' शब्द है। 'निः' 'त्रि' और 'शो' (शा) धातु इन तीन शब्दोंके मेलनसे 'निस्त्रिंश' शब्द बना है। तीन प्रदेशों अर्थात् दो धार और एक अग्रसे निशित या पैन' (तीक्ष्ण) होकर छेदन करता है, वह 'निस्त्रिंश' कहलाता है। अर्थात् खड्ग। क्योंकि वहीं इस शब्दकी मुख्य अर्थके ग्रहणसे समझस वृत्ति होती है, किन्तु यह शब्द छेदनरूप क्रूरता सामान्यको लेकर सब जगह प्रवृत्त है। जो ही लोकमें क्रूर होता है, वही 'निस्त्रिंश' नामसे बोला जाता है। इस रीतिसे ये शब्द क्रिया-रूप गुणके सामान्य मात्रको लेकर अन्यत्र अन्यत्र अर्थोंमें रहते हैं। जैसे कि—ये हैं, ऐसे ही और शब्दोंमें भी ऊहा या कल्पना करना। और कल्पना करके अर्थ सामान्यसे निर्वचन करना। स्वर और वर्ण सामान्यके बहुत उदाहरण हैं, अर्थात् जितने नैगम शब्द शब्दीय, काण्डमें आवेंगे सब स्वर-वर्ण सामान्यमात्रसे ही निर्वचन किये जाते हैं। निरुक्तमें कारक, हारक, लावक, — आदि शब्दोंकी व्युत्पत्ति नहीं की जाती, क्योंकि—उनकी व्युत्पत्ति सीधी और व्याकरणमें प्रसिद्ध