Skip to content
BharatKosha
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

Page 179 of 1282

Read in context
Page 179

[Page Header: हिन्दी निरुक्त । ११]

और भी—वर्णकी उत्पत्ति होती है। [जैसे] 'आस्थत्' ['असु' क्षेपणे (दि० प०) धातुसे, ['वृङ्' संभक्तौ (भ्वा० आ०) धातुसे ] 'वार' और [ 'भ्रस्ज' पाके (तु० उ०) धातुसे ] 'भरूज' शब्द बनता है ॥ [द्विस्वभाव धातुका लक्षण ] सो-जहां या जिस धातुरूपमें स्वरसे पूर्व या पर व्यवधान रहित अन्तस्थ (य, र, ल, व, मेंसे कोई) वर्ण धातुके मध्यमें हो, वह द्विस्वभाव धातुओंका स्थान है, ऐसा आचार्य कहते हैं। वहां जो अर्थ सिद्ध या निश्चित है, वह एक रूपसे सिद्ध न हो, तो दूसरे धातु रूपसे उपपादन करे या घटावे। वहां पर भी यह देखना चाहिये, कि—कोई धातु थोड़े ही प्रयोगोंमें सप्रसारणी होते हैं। सो जिस प्रकार यह—'ऊति'—गत्यर्थक 'अव' (भ्वा० प०) धातुसे, 'मृदु'-'म्रद्' मर्दने (भ्वा० आ०) धातुसे 'पृथु' 'प्रथ' प्रख्याने (भ्वा० आ०) धातुसे, 'पृषत'-'प्रुष' दाहे (भ्वा० प०) धातुसे और 'कुगाह' शब्द 'कग' शब्दे (भ्वा० प०) धातुसे होता है। और भी—[द्रष्टव्य यह है] लौकिक धातुओंसे वैदिक कृदन्त शब्दोंका निर्वचन होता है। [जैसे] 'दमूनाः' 'दम' उपशमे (दि० प०) धातुसे, और 'साध' संसिद्धौ (स्वा० प०) धातुसे सिद्ध होता है। और भी-[द्रष्टव्य यह है] वेद प्रसिद्ध धातुओंसे भाषिक या लोकके शब्द [निर्वचन किये जाते हैं।] [जैसे] 'उष्ण-शब्द 'उष' दाहे [वेद प्रसिद्ध, भ्वा० प०] धातुसे और 'घृत' शब्द 'घृ' क्षरण दीप्त्योः (जु० प०) धातुसे होता है। और भी-[देखना चाहिये] कोई स्थानोंमें धातुओंकी प्रकृति या आख्यात रूपोंसे व्याख्या की जाती है, और कोई स्थानोंमें धातुओंकी विकृति या नाम रूपोंसे व्याख्या की जाती है॥३॥