निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
Page 22 of 1282
Read in contextहिन्दी निरुक्त । २१ 'पचति' के साथ 'ओदनम्' की आवश्यकता । यद्यपि क्रियाके विशेषरूप जो पाक पठन आदि व्यापार हैं, उनके जानने के लिए जो प्रश्न होता है, कि-'क्या करता है' उसके उत्तरमें भी 'ओदनं पचति' ऐसा वाक्य कहा जाता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि-'पचति' के समान 'ओदनम्' पद भी क्रिया- का बोधक है, और वह आख्यातकी क्रिया-प्रधानताको कुछ छीन लेगा, किन्तु वास्तवमें 'ओदनम्' पद क्रियाके विशेषरूपके बतानेके लिए नहीं कहा जाता, बल्कि उत्तर देनेवालेके हृदयमें उत्तर देते हुए पाक क्रियाके बतानेके समय अगाऊ शङ्का उठती है कि-जब मैं कहूँगा- 'पकाता है' तो उस पर 'क्या?' ऐसा प्रश्न, जिसका विषय पकाईजानेवाली वस्तु होती है- अवश्य होगा, इससे पाक क्रियाके बतानेके साथ ही 'ओदनम्' पद कह कर भविष्यत् प्रश्न, जो उसका अत्यन्त समीपी है- शान्त कर दिया जाय, इस लिए 'पचति' की आवश्यकता पर 'ओदनम्' भी कहा जाता है, इससे यह सिद्ध होता है कि-आ- ख्यातकी क्रिया-प्रधानताको अन्य कोई भी पद नहीं ले सकता है। यह भाव निकला कि-जब 'ओदन पचति' ऐसा उत्तर होता है, उस में 'ओदनम्' के लिए बिना किया हुआ भी 'क्या?' ऐसा प्रश्न बुद्धिमें अलग कल्पित कर लिया जाता है। सुतराम्, “ओदनम्” पदका क्रियाके कथनमें कोई सामर्थ्य नहीं है, आख्यात ही उसका स्वतन्त्र बोधक है। क्रियाके स्वभावसे आख्यातकी क्रिया-वाचकता । क्रियाका स्वभाव है, कि-वह मूर्त्त या परिच्छिन्न द्रव्यमें रह- ती है, और प्रकारके द्रव्य या क्रिया आदि किसी पदार्थमें नहीं रह सकती, इससे यह सार निकला कि 'जो क्रियावाचक शब्द होगा वह भी योग्य सम्बन्धसे एक वाक्यमें वैसे द्रव्यवाचक शब्द