निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context२६ अ० १ पा० १ ख० १ । वाचक और कर्म-कर्तृ-वाचक । जैसे—कर्तृ० 'पचति', कर्म० 'पच्यते', भाव० 'भूयते', और क० क० 'पच्यते-स्वयमेव' । इन चारों आख्यातोंमें अवयव या प्रत्यय (तिप् आदि) के अर्थ द्रव्य हैं, वे अप्रधान हैं, और प्रकृति जो धातु (पच आदि) है, उसका अर्थ (क्रिया) प्रधान है। उसका अभिधान करनेसे यह आख्यात कहाता है अर्थात् प्रधानोभूत क्रिया ही इसका लक्षण है । अथ नामलक्षणम् । (संगति) आचार्यने चारो पदोंकी गणनाके समय 'नामाख्याते' इस पदमे व्याकरणके नियमके अनुरोधसे आख्यातकी अपेक्षा नामकी गणना पहिले की है, किन्तु लक्षणका क्रम उत्पत्तिके क्रमानुसार किया है, उत्पत्तिमे आख्यात पहिले है, और नाम आख्यातसे उत्पन्न होनेके कारण उससे पीछे है। इसी उत्पत्ति के क्रमके अनुरोधसे गणनाक्रमको भङ्ग करके आख्यातके लक्षणके अनन्तर नामका लक्षण किया । लक्षण । (नि०) “सत्वप्रधानानि नामानि” लिङ्ग और संख्यावाले पदार्थको द्रव्य या सत्व कहते हैं, जिस पदमें द्रव्य प्रधानतासे कहा जावे, और क्रिया गौणभावसे वह 'नाम' कहाता है । नाम शब्दकी व्युत्पत्ति । (क) नमन्ति आख्यातशब्दे गुण- भावेन यानि, तानि नामानि । जहां वाक्यमे नाम और आख्यात दोनों इकट्ठे होते हैं,