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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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अ० १ पा० १ ख० १ । (नि०) छन्दोभ्यः समाहृत्य समाहृत्य समाम्नाताः । जिससे कि—ये शब्द छन्दों या मन्त्रोंसे चुनचुनकर क्रमसे संग्रह किये हैं, इससे येही अन्य शब्दोंके अर्थोंके जनानेमें समर्थ हैं। मन्त्रोंसे येही शब्द क्यों संग्रह किये हैं ? मन्त्रोंसे इन्हीं शब्दोंका चुनाव इस•लिए किया गया कि ये शब्द मन्त्रार्थके जाननेके लिये प्रवृत्त हुए पुरुषको मन्त्रोंमें अवश्य मिलते है, ये ऐसे अतिपरोक्षवृत्ति या अतिगूढार्थ हैं, जिनके कारण मेधावी तपस्वी तथा लक्षण, विनियोग, ऋषि, छन्द और देवताओंके निदानके जाननेवाले विद्वान् भी मन्त्रार्थ के जाननेमें असमर्थ हो जाते हैं । जब इन शब्दोंके अर्थका परिज्ञान होजाता है, तो वैसे पुरुषोंकी बुद्धि विना किसी रुकावटके ही मन्त्रार्थमें प्रवेश कर जाती है । अपने मतमें दूसरे आचार्य की सम्मति— (नि०) ते निगन्तव एव सन्तो निगमनान्निघण्टव उच्यन्ते, इत्यौपमन्यवः । औपमन्यव आचार्य मानते हैं कि—इन शब्दोंका मन्त्रोंसे उद्धार या•अलग करनेके पश्चात् निघण्टु नाम नहीं पड़ा और न गवादि- देवपत्नी–पर्यन्त ग्रन्थके रूपमें होनेसे ही यह उनका नाम है बल्कि, इनमें जो निगमन या अर्थके जनाने की शक्ति है, उसीके कारण नित्य अपने स्थान ( मन्त्रो ) में स्थित ही निघण्टु हैं, चाहे वे किसी निरुक्तमें संग्रह किये गये हों, अथवा अब तक मन्त्रोंमें ही पढ़े जाते हों । उपमन्यु या जिसका क्रोध निवृत्त हो गया, ऐसे ऋषिके पुत्रको औपमन्यव कहते हैं । औपमन्यव आचार्यने जैसी व्युत्पत्ति का ह, उससे प्रतीत होता

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