निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
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Read in context५४ अ० १ पा० १ खं० २। अपक्षय भाव विकारके स्थिति कालमें विनाशभाव क्रम क्रमसे बनता जाता है, किन्तु अपूर्णताके कारण वह किसी शब्दसे निर्देश नहीं किया जाता। इस पंचम भाव विकारको 'अपक्षीयते' इस आख्यात पदसे बोधन करते हैं। यह पद अपर भाव जो इससे पीछे प्रकट होनेवाला है, उसे न कहता है और न निषेध ही करता है, किन्तु इसकी अर्थ बोधन शक्ति अपक्षयके बोधन करने तक परिमित है। ६ ठा, अपर भाव। (नि०) विनश्यति-इत्यपरभावस्यादिमाचष्टे न पूर्वभावमाचष्टे न प्रतिषेधति। जिस प्रकार जन्म नाम प्रथमभाव विकार उससे पूर्व अन्यभाव विकारके न होनेसे केवल पूर्वभाव विकार कहा जाता है, ऐसे ही विनाशभाव विकारके अनन्तर कोई भावविकार होनेवाला नहीं है, इसीसे यह केवल अपर भावविकार ही है। मध्यके चार सत्ता आदि भावविकार होते हैं, अपनेसे पूर्वके अपर भाव, और परके पूर्वभाव हैं। जब अंगोंका ह्रास या अपक्षयभाव—विकार अपनी मर्यादाको पूरी कर लेता है, तो नाश ही अवशेष रहता है। इस लिये उसके पश्चात् इसीका स्थिति काल है। यह भावविकार 'विन- श्यति' आख्यात पदसे बोला जाता है। हिन्दीमें उस विकारा- वस्थांको 'नाश होता है, इस क्रियासे प्रकाश करते हैं! विशेष तथा स्पष्टी-करण। यद्यपि जिस प्रकार मृत्तिका में घट शराव आदि सभी विकार रहते हैं, उसी प्रकार कारणात्मक भावमें सभी भाव विकार रहते हैं, किन्तु मृत्तिका में घट शराव आदि विकार एकवार ही सब ही