निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
Page 81 of 1282
Read in contextहिन्दी निरुक्त । ८१ गिरः । गृणातेः । “अयमुते समतसि” । अयं ते समतसि इवोऽपि दृश्यते ॥ ५ ॥ ॰ [जैसे] “पर्याया इव त्वदाश्विनम्” [ऋ० प्रा० १२, १०] आश्विन और पर्याय। यहांसे पदपूरण निपात हैं। गद्य ग्रन्थोंमें जो निपात अन्य पदोंसे ही अर्थ पूरा होनेपर वाक्यकी पूर्त्तिके लिये आते हैं, वे ही पद्य ग्रन्थोंमें पदपूरण होते हैं। दोनों ही स्थलोंमें अनर्थक होते हैं। [कौन] ‘कम्’ ‘ईम्’ ‘इत्’ ‘उ’ ये चार निपात। [जैसे ‘कम्’] “निष्ठूक्त्रासः”००० कम्” [ ] वस्त्रोंसे रहित बहुत सन्तानवाले कोई दरिद्र मनुष्य हेमन्त ऋतुमें भेड़ियेके समान जाड़ेसे डरते हुए ऐसा पुकारते थे, कि ‘शिशिर ऋतु हमारे जीवनके लिये आता है।’ [क्योंकि उसमें शीत कम होता है, इससे उसमें हम सुखसे जीवेंगे।] शिशिर ऋतु जीवनके अर्थ होता है। [क्योंकि उसमें शरद् ऋतुके बहुत धान्य पैदा होते हैं। ‘शिशिर’ शब्द ‘शृ’ हिंसायाम् धातुसे होता है। अथवा ‘शम्’ हिंसार्थक धातुसे बनता है। [क्योंकि उस कालमें निर्विघ्न होकर दावानल या वनका अग्नि सूखे ओषधि और वनस्पतियोंको जला देता है। [ईम्] “एमेनम्०” [ऋ० सं० १, १, १७, २] हे अध्वर्युओ ! सोमके निचूड़ जानेपर इसे उक्थ पात्र और चमस पात्रोंसे तैयार करो। [इत्] “तमिद् वर्द्धन्तु नो गिरः” [ऋ० सं० ७, १, २०, ५] हमारी वाणियें उस सोमको वीर्ययुक्त करें। ‘गिर्’ नाम स्तुतिका है। [उ] “अयमु ते समतसि” [ऋ० सं० १, २, २८, ४] हे इन्द्र ! यह तेरा सोम है, जिसके लिये तू नित्य गिरता है। और ‘इव’ भी कभी अनर्थक आता है ॥ ५ ॥ ११