निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
by महर्षि यास्क मुनि
DevanagariHindipublished1,282 pages
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८४ अं० १ पा० २ ख० २ । निपात । अर्थ । स्थान । उदाहरण । वेदे:—( १ ) “अग्निरिव”† ४ [ऋ० सं० ८, ३, १६,२ ] ( २ ) “इन्द्र ( १ )—इव—उपमा इव” ५ [ ऋ० सं० ८, ८, ३१, २ ] लोके:—( १ ) अग्निरिव तीक्ष्णः ६ (२) इन्द्रइव विक्रान्तः ७ लोके:—( १ ) घटो नास्ति— ( २ )—न * प्रतिषेध: वेदे:—( १ ) नेन्द्रं देवममंसत ८ [ ऋ० सं० ८, ३, २६, १ ) उपमां— वेदे:—( १ ) दुर्मदासो न सुरायाम् ६ [ऋ० सं० ५, ७, १६, १] द्वितीयः खण्डः । पूजा—लोके—(१) आचार्यञ्चिदिदं ब्रूयात् १० ( ३ )—चित् — उपमा—लोके—(२) दधिचिदोदनः ११ अनेककर्मा निन्दा—लोके—(३) कुल्माषांश्चिदाहर १२
- वेदमें 'न' निपातके प्रतिषेध और उपमा दो अर्थ होते हैं । प्रतिषेध अर्थ मे प्रतिषेध्यसे पूर्व और उपमा अर्थ मे उपमेयके अनन्तर आता है । † ‘अग्निरिव मन्यो त्विषित सहस्व सेनानीर्न सहुरे हतन्धि । हत्वा य शत्नून्भजस्व वेद चौजा सिमामो विषुधो नुदस्व” ॥ [ ऋ० स० ८, ३, १६, २ ] तमस का पुत्र मन्यु ऋषि । त्रिष्टुप् छन्द । मन्यु देवता । श्येनादिकोंमें निष्क्री वल्लभे मन्त्र । १—उपमा अर्थौ येवा ते उपमार्थका । उपमा रूप अर्थवाले शब्द उपमार्थक कहलाते हैं । उपमा नाम—किसी वस्तुमें कोई गुण प्रसिद्ध हो तथा वही गुण उससे अन्य किसी वस्तुमें रहकर भी अप्रसिद्ध हो, उस अप्रसिद्ध गुणवाले वस्तुमें शब्दभावके सम्बन्धसे उस गुणका प्रकाश करना है । (नोट) यह मन्यु इन्द्र ही है क्योकि आत्मवित् और नैरूक्तोके मतमें माहाभाग्य तथा कर्मके भेदसे एक देवताके बहुत नाम हो जाते हैं जैसे कि “मन्युरिन्द्रो मन्युरेवा स देवो मन्युर्होता वरुणो जातवेदा’” ( ऋ० ८, ३, १६, २ ) यह ऋचा है । याज्ञिकोंके मतमें इस नाम
- का स्वतन्त्र देवता है ।