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निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

by महर्षि यास्क मुनि

DevanagariHindipublished1,282 pages

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६६ अ० १ पा० ३ ख० ६ । ईम्--पदपूरण--वेदे--*एमेनं सृजता सुते .(ऋ०स० १,१,१७,२)

  • व्याख्या:-आसृजतैनं सुते--आभिमुख्येन-'ईम्' इति पदपूरण एव । इत्--पदपूरण--वेदे--१ तमिद्वर्द्धन्तु नो गिरो वत्स सशिश्वरीरिव । य इन्द्रस्य हृद् सनिः [ऋ०सं०-७ १-२०-५] उ--पदपूरण--वेदे--२ अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तच्चिन्न ओहसे ॥ [ऋ०स०१-२-२८-४] अयम् इति वर्त्तमान सन् अय मान य प्रात नित्यकालमेव त्वं सम्पतसि उ-इति पदपूरण ( षष्ठः खण्डः ) ( कदाचित् ) इव--वाक्यपूरण (१) सुविदुरिव व्या०( सृष्टु विदु यज्ञज्ञ ब्राह्मण, इति ) (२) सुविज्ञायते इव [इवोऽनर्थक एव वाक्य पूरण ] [व्याख्या —सृष्ट विज्ञायते यज्ञज्ञो नक्षत्र ब्राह्मणै ]

उनको पाठ मिला वह उन्होंने पूर्णरूपसे यह उद्धृत कर दिया है । किन्तु “केचित्” पदके द्वारा इसमें वे अपनो अरुचि प्रकट करते है। प० सत्यव्रत सामश्रमी महाशयने इसका ऋक्सं हितामे पता दिया है वहाँ दूसरे उदाहरणके अनुसार पता व पाठ है । “शिशिरं जीवनाय कम्” इस मन्त्रमें ‘कम्’ यह निपात पदपूरण है । शेष वाक्यका यह अर्थ है, कि-शिशिर ऋतु प्राणियोंके जीवनके लिये होता है क्योकि उसमें शरद्ऋतुके बोये हुये धान्य बहुत निपजते है । सम्पूर्ण मन्त्रका अर्थ--कोई वस्त्रहीन बहुतसन्तानवाले दरिद्र मनुष्य हेमन्तऋतुमे शीतसे भेड़ियेके समान डरते हुये बार बार चिल्लाते हैं, कि 'हमारे जीवनके लिये शिशिर ऋतु आता है,

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