नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)
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Read in contextअर्थसमुद्देशः ११ अर्थनाश का कारण— तीर्थमर्थेनासंभावयन् मधुच्छत्रमिव सर्वात्मना विनश्यति ॥ ४ ॥ धन के द्वारा जो तीर्थ का सत्कार नहीं करता उसका मधुमक्खी के छत्ते के समान सर्वनाश हो जाता है । विशेषार्थ—तीर्थ का अर्थ अग्रिम सूत्र में है । मधुमक्खी के छाते में जब मधु अधिक इकट्ठा हो जाता है तो मक्खियाँ उसे स्वयं पी जाती हैं यदि उन्हें न पीने दिया जाय तो भी छत्ते का मधु अपने आप नष्ट हो जाता है या मोम बन जाता है । इसी तरह दान-मान द्वारा तीर्थ की पूजा न की गई तो धनी का धन भी नष्ट हो जाता है । तीर्थ का लक्षण— धर्मसमवायिनः कार्यसमवायिनश्च पुरुषास्तीर्थम् ॥ ५ ॥ धार्मिक कृत्यों में सहयोग देने वाले और सब कामों में हाथ बटाने वाले पुरुषों को तीर्थ कहते हैं । किन का धन नष्ट हो जाता है— तादात्विक-मूलहर-कदर्येषु नासुलभः प्रत्यवायः ॥ ६ ॥ तादात्विक, मूलहर और कदर्य धनिकों का धन सदा नष्ट हो जाता है । तादात्विक का लक्षण— यः किमप्यसंन्चिन्त्योत्पन्नमर्थं व्ययति स तादात्विकः ॥ ७ ॥ उपार्जित धन को जो बिना विवेक के खर्च करता है उसे 'तादात्विक' कहते हैं । मूलहर का लक्षण— यः पितृपैतामहमर्थमन्यायेन भक्षयति स मूलहरः ॥ ८ ॥ पिता और पितामह से प्राप्त सम्पत्ति को जो अन्यायपूर्वक अर्थात् जुआ, शराब, वेश्यावृत्ति आदि में उड़ाता है वह 'मूलहर' कहा जाता है । कदर्य का लक्षण— यो भृत्यात्मपीडाभ्यामर्थं संचिनोति स कदर्यः ॥ ९ ॥ सेवकों को और स्वयम् को भी कष्ट में रख कर जो धन का संग्रह करता है उसे 'कदर्य' कहते हैं । तादात्विक और मूलहर का भविष्य— तादात्विकमूलहरयोरायत्यां नास्ति कल्याणम् ॥ १० ॥ तादात्विक और मूलहर का परिणामावस्था में कल्याण नहीं होता । कदर्य के धनसंग्रह का परिणाम— कदर्यस्यार्थसंग्रहो राजदायादतस्कराणामन्यतमस्य निधिः ॥ ११ ॥