नीतिवाक्यामृतम् (आचार्य सोमदेव सूरि - पण्डित रामचन्द्र मालवीय सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Nitivakyamritam of Somadeva Suri with Commentary
by आचार्य सोमदेव सूरि (टीकाकार: पं. रामचन्द्र मालवीय)
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Read in context६८ नीतिवाक्यामृतम् हठी को हित उपदेश देना बहिरे के आगे गाने के समान निष्फल है । अकार्यज्ञस्य शिक्षणमन्धस्य पुरतो नर्त्तनमिव ॥ ४१ ॥ कर्त्तव्य ज्ञान से शून्य पुरुष को शिक्षा देना अन्धे के आगे नाचने के समान व्यर्थ है । अविचारकस्य युक्तिकथनं तुषकण्डनमिव ॥ ४२ ॥ विचारशून्य व्यक्ति से युक्तियुक्त बात कहना भूसे को कूटने के समान निरर्थक है । नीचेषूपकृतमुदके विशीर्णं लवणमिव ॥ ४३ ॥ नीच व्यक्तियों के साथ उपकार करना पानी में विखेरे गये नमक के समान है । अविशेषज्ञे प्रयासः शुष्कनदीतरणमिव ॥ ४४ ॥ विशेष बुद्धि न रखने वाले अर्थात् मूर्ख को समझाने का प्रयास सूखी नदी में तैरने के समान है । परोक्षे किलोपकृतं सुप्तसंवाहनमिव ॥ ४५ ॥ परोक्ष में किया गया उपकार सोये हुए व्यक्ति के पैर दबाने के समान है । अकाले विज्ञप्तमूपरे कृष्टमिव ॥ ४६ ॥ अनवसर में कही गई बात ऊसर जमीन जोतने के समान है ।, उपकृत्योद्घाटनं वैरकरणमिव ॥ ४७ ॥ उपकार करके उसे प्रकाशित करना शत्रुता करने के समान है । अफलवतः प्रसादः काशकुसुमस्येव ॥ ४८ ॥ परिणाम में कुछ न कर सकने वाले व्यक्ति का प्रसन्न होना काश के फूल के समान है । 'काश' में केवल फूल होते हैं फल नहीं लगते उसी प्रकार जो व्यक्ति अथवा नृपति न कुछ भलाई कर सके न कुछ द्रव्य आदि दे सके उसे प्रसन्न करना या उसकी कृपा व्यर्थ है । गुणदोषाननिश्चित्यानुग्रहनिग्रहविधानं ग्रहाभिनिवेश इव ॥ ४९ ॥ गुण और दोष का निश्चय किये बिना अनुग्रह अथवा निग्रह-दण्ड देना- राहु, केतु आदि ग्रहों के अभिनिवेश के समान है अर्थात् अपना ही बाधक होता है । उपकारापकारासमर्थस्य तोषरोपकरणमात्मविडम्बनमिव ॥ ५० ॥ उपकार अथवा अपकार करने में असमर्थ व्यक्ति को संतुष्ट करना अपनी ही परिहास कराना है । शूद्रस्त्रीविद्रावणकारी गलगर्जितं ग्रामशूराणाम् ॥ ५१ ॥