न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context८२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० तावताऽऽत्मानं जहाति, तावता ह्यनुज्ञाताऽव्यवस्था। एवमियं क्रियमाणापि शब्दान्तरकल्पना नार्थान्तरं साधयतीति। यत्पुनरेतत्-‘तथाऽत्यन्तसंशयः तद्धर्मसातत्योपपत्तेः’ इति ? नायं समान- धर्मादिभ्य एव संशयः, किं तर्हि ? तद्विषयाध्यवसायाद् विशेषस्मृतिसहितादित्यतो नात्यन्तसंशय इति। अन्यतरधर्माध्यावसायाद्वा न संशय इति ? तन्न युक्तम्; ‘विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः’ इति (१. १. २३) वचनात् । विशेषश्चान्यतरधर्मः, न तस्मिन्नध्यवसी- यमाने विशेषापेक्षा सम्भवतीति ॥ ६ ॥ यत्र संशयस्तत्रैवमुत्तरोत्तरप्रसङ्गः ॥ ७ ॥ यत्र यत्र संशयपूर्विका परीक्षा शास्त्रे कथायां वा, तत्र तत्रैवं संशये परेण प्रतिषिद्धे समाधिर्वाच्य इति। अतः सर्वपरीक्षाव्यापित्वात् प्रथमं संशयः परीक्षित इति ॥ ७ ॥ अव्यवस्थास्वरूप में व्यवस्थित रहने के कारण वे अपना अव्यवस्थात्व नहीं छोड़ पातीं । इस रूप में पूर्वपक्षी ने भी उनको 'अव्यवस्था' माना है। इसलिये इसकी शब्दान्तर- कल्पना से भी अर्थान्तर की सिद्धि नहीं हो सकेगी। यह जो कहा था—'उस धर्म की निरन्तरोपपत्ति से सदा संशय होने लगेगा' ? इसका उत्तर यह है—केवल समानधर्मादिकों के रहने से ही संशय नहीं होता, अपितु विशेष धर्मों के स्मृतिसहित तद्विषयक अध्यवसाय से होता है, अतः आत्यन्तिक संशय की उपपत्ति नहीं बनेगी । पूर्वपक्षी ने जो यह कहा था—'किसी एक के धर्माध्यवसाय से संशय नहीं होता' ? यह भी युक्त नहीं; हम ' 'विशेष धर्म ( के ज्ञान ) की अपेक्षा रखनेवाला विमर्श 'संशय' होता है" ( १.१.२३ ) ऐसा कह आये हैं । विशेष का मतलब है दो में अन्यतर धर्म, उसका निश्चय होने पर विशेषापेक्षा नहीं होती ॥ ६ ॥ जहां (जिस प्रमाणादि की परीक्षा में) संशय हो वहाँ वहाँ (वैसी परीक्षा में) इसी तरह उत्तरोत्तर प्रयोजनादि में परीक्षा-प्रसङ्ग करना चाहिये ॥ ७ ॥ जहाँ जहाँ, शास्त्र या कथा में, संशयपूर्वक परीक्षा का अवसर आये वहाँ वहाँ इस तरह संशय होने पर प्रतिवादी द्वारा खण्डन करने पर उत्तर देना चाहिये । अतः कथाङ्ग होने, तथा सभी प्रमाणादि पदार्थों की परीक्षा में व्यापक होने के कारण सर्वप्रथम संशय की परीक्षा की गयी है ॥ ७ ॥