न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context८४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० १. आ० यदि प्रमाणं प्रमेयं च युगपद्भवतः, एवमपि गन्धादिष्विन्द्रियार्थेषु ज्ञानानि प्रत्यर्थनियतानि युगपत्सम्भवन्तीति ज्ञानानां प्रत्यर्थनियतत्वात् क्रमवृत्तित्वाभावः । या इमा बुद्धयः क्रमेणार्थेषु वर्त्तन्ते तासां क्रमवृत्तित्वं न सम्भवतीति । व्याघात- श्च 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति । एतावांश्च प्रमाणप्रमेययोः सद्भावविषयः, स चानुपपन्न इति । तस्मात्प्रत्यक्षादीनां प्रमाणत्वं न सम्भवतीति । अस्य समाधिः—उपलब्धिहेतोरुपलब्धिविषयस्य चार्थस्य पूर्वापरसहभावा- नियमाद् यथादर्शनं विभागवचनम् । क्वचिदुपलब्धिहेतुः पूर्वम्, पश्चादुपलब्धि- विषयः, यथा—आदित्यस्य प्रकाश उत्पद्यमानानाम् । क्वचित्पूर्वमुपलब्धिविषयः, पश्चादुपलब्धिहेतुः, यथा—अवस्थितानां प्रदीपः । क्वचिदुपलब्धिहेतुरुपलब्धि- विषयश्च सह भवतः, यथा—धूमेनाग्नेर्ग्रहणमिति । उपलब्धिहेतुश्च प्रमाणम्, प्रमेयं तूपलब्धिविषयः । एवं प्रमाणप्रमेययोः पूर्वापरसहभावेऽनियते यथा अर्थो दृश्यते, तथा विभज्य वचनीय इति । तत्रैकान्तेन प्रतिषेधानुपपत्तिः । सामान्येन खल्वविभज्य प्रतिषेध उक्त इति । यदि प्रमाण तथा प्रमेय की युगपद् सम्भूति मानें तो गन्धादि इन्द्रियार्थों में प्रत्यर्थ- नियत ज्ञान की भी युगपत् उत्पत्ति माननी पड़ेगी, परन्तु ज्ञान के प्रत्यर्थनियत होने से उसमें क्रमवृत्तित्व कैसे आयेगा ! तात्पर्य यह है कि जो बुद्धियाँ क्रमशः अर्थ का अवगाहन करती हैं उनका क्रमवृत्तित्व संभव नहीं है। और 'युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन का इन्द्रिय- त्वसाधक हेतु हैं' (१.१.१६) इस मन के लक्षण का भी विरोध होने लगेगा । प्रमाण- प्रमेय में अस्तित्व यही विषय है, और यही अनुपपन्न होने लगेगा ! अतः प्रत्यक्षादि में प्रमाणत्व सम्भव नहीं—ऐसा पूर्वपक्षी का मत है । समाधान—शास्त्र में उपलब्धि-हेतु और उपलभ्यमान अर्थ का पूर्वकाल या उत्तर- काल में या एक साथ होना—यह नियम न देखा जाने के कारण दर्शनानुसार ही विभाग कहा गया है । कहीं उपलब्धि-हेतु पहले रहता है, उपलब्धि-विषय वाद में, जैसे—उत्पन्न होने वाले पदार्थों के पूर्व सूर्य का प्रकाश । कहीं उपलब्धि-विषय पहले रहता है, उपलब्धि-हेतु बाद में, जैसे—पहले से उपस्थित पदार्थों के लिए दीपक । कहीं उपलब्धि-हेतु तथा उपलब्धि-विषय एक साथ रहते हैं, जैसे धूम से अग्नि का ज्ञान । उपलब्धि-हेतु है प्रमाण तथा उपलब्धि-विषय है प्रमेय । इस प्रकार प्रमाण-प्रमेय का पूर्वापरसहभाव नियत न होने के कारण, अर्थ जैसा देखा जाता है उसी तरह विभाग करके कह दिया जाता है; अतः यहाँ पूर्वपक्षी द्वारा एक एक का नियम मान कर दिये गये दोष नहीं बन सकते । यों पूर्वपक्षी ने विवेचन न कर सामान्येन जो दोष कहे थे वे उक्त समाधान से निरस्त कर दिये गये ।