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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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८६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० इति ? किं सम्भवो निवर्त्यते, अथासम्भवो ज्ञाप्यत इति ? तद्यदि सम्भवो निवर्त्यते, सति सम्भवे प्रत्यक्षादीनां प्रतिषेधानुपपत्तिः । अथासम्भवो ज्ञाप्यते, प्रमाणलक्षणं प्राप्तस्तर्हि प्रतिषेधः, प्रमाणासम्भवस्योपलब्धिहेतुत्वादिति ॥ ११ ॥ किं चातः ? त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १२ ॥ अस्य तु विभागः । पूर्वं हि प्रतिषेधसिद्धावसति प्रतिषेध्ये किं तेन प्रतिषिध्यते ! पश्चात्सिद्धौ प्रतिषेधाभावादिति । युगपत्सिद्धौ प्रतिषेध्यसिद्धयभ्यनुज्ञानादनर्थकः प्रतिषेध इति । प्रतिषेधलक्षणे च वाक्येऽनुपपद्यमाने सिद्धं प्रत्यक्षादीनां प्रमाणत्वमिति ॥ १२ ॥ कथम् १ ? सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १३ ॥ 'त्रैकाल्यासिद्धेः' इत्यस्य हेतोर्यद्युदाहरणमुपादीयते, हेत्वर्थस्य साधकत्वं कर के आप क्या करना चाहते हैं ? क्या सम्भव की निवृत्ति कर रहे हैं या असम्भव को बतला रहे हैं ? यदि सम्भव की निवृत्ति कर रहे हैं तो सम्भव होने पर प्रत्यक्षादि की निवृत्ति कैसी ! यदि असम्भव बतला रहे हैं तो असम्भव का ज्ञापन कैसा ? क्योंकि आपका उक्त प्रकारका ज्ञापन भी उक्त प्रमाणों के लक्षण की परिधि में ही आ गया ! आपने ही तो कहा था कि प्रत्यक्षादि में प्रमाण का असम्भव उपलब्धि का कारण है ! ॥ ११ ॥ इससे क्या हुआ ? त्रैकाल्य की सिद्धि न बनने से पूर्वपक्षयुक्त प्रतिषेध नहीं बन सकता ॥ १२ ॥ ( पूर्वपक्षी को उत्तर देने के लिये ) इस सूत्र का वक्ष्यमाण विभागार्थ कर लेना चाहिये । प्रस्तुत प्रमाण की सिद्धि होने पर प्रतिषेध्य के न रहने से वह किसका प्रतिषेध करेगा ? पश्चात् काल में प्रतिषेध्य मानने पर उस समय प्रतिषेध न कर पाने से प्रतिषेध्य की असिद्धि ही रहेगी । युगपत् (एक काल में) सिद्धि मानने पर पूर्वपक्षी द्वारा प्रतिषेध्य की स्वीकृति दे देने से उसका प्रतिषेध निरर्थक हो जायेगा । प्रतिषेध-लक्षणार्थक वाक्य के अनुपपन्न होने से प्रत्यक्षादि में प्रमाणत्व रह ही जायेगा ॥ १२ ॥ कैसे ? क्योंकि सम्पूर्ण प्रमाणों का निषेध करने से भी प्रतिषेध नहीं बन सकेगा ॥ १३ ॥ यदि 'त्रैकाल्यासिद्धि' हेतु का उदाहरण देने का प्रयत्न करे तो उसमें हेत्वर्थसाधकत्व १. पदमिदं क्वचित् सूत्रस्यावतरणरूपेण गृहीतम्, क्वचिच्च व्याख्यानरूपेणेत्युभयथापि समञ्जसमेव प्रतिभाति ।

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