BharatKosha
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

Page 106 of 410

Read in context
Page 106

८८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० हेतोरुपलब्धिविषयस्य चार्थस्य पूर्वापरसहभावानियमाद् यथादर्शनं विभाग- वचनम्' इति, तदितः समुत्थानं यथा विज्ञायेत । अनियमदर्शी खल्वयमृषि- र्नियमेन प्रतिषेधं प्रत्याचष्टे । त्रैकाल्यस्य१ चायुक्तः प्रतिषेध इति । तत्रैकां विधामुदाहरति-शब्दा- दातोद्यसिद्धिवदिति । यथा पश्चात्सिद्धेन शब्देन पूर्वसिद्धमातोद्यमनुमीयते । साध्यं चातोद्यम्, साधनं च शब्दः, अन्तर्हिते ह्यातोद्ये स्वनतोऽनुमानं भवतीति । 'वीणा वाद्यते', 'वेणुः पूर्यते' इति स्वनविशेषेण आतोद्यविशेषं प्रतिपद्यते । तथा पूर्वसिद्धमुपलब्धिविषयं पश्चात्सिद्धेनोपलब्धिहेतुना प्रतिपद्यते इति । निदर्शनार्थत्वाच्चास्य, शेषयोर्विध्योर्यथोक्तमुदाहरणं वेदितव्यमिति । कस्मात् पुनरिह तन्नोच्यते ? पूर्वोक्तमुपपाद्यत इति । सर्वथा तावदयमर्थः प्रकाशयितव्यः-स इह वा प्रकाश्येत, तत्र वा; न कश्चिद्विशेष इति ॥ १५ ॥ प्रमाणं प्रमेयमिति च समाख्या समावेशेन वर्त्तते; समाख्यानिमित्तवशात् । समाख्यानिमित्तं तूपलब्धिसाधनं प्रमाणम्, उपलब्धिविषयश्च प्रमेयमिति । पहले कही बात को ही पुष्ट करने के लिये । हमने जो पहले यह कहा था कि 'उपलब्धि- हेतु तथा उपलब्धि-विषय अर्थ में पूर्व-अपर काल या सहभाव का नियम न होने के कारण यथादर्शन विभाग कहा गया हैं' यह बात यहीं से आधार लेकर कही थी। प्रमाण- प्रमेय-नियम न मानने वाले सूत्रकार ने नियम से प्रतिषेधपक्ष का खण्डन किया हैं। त्रैकाल्य का प्रतिषेध अयुक्त है, इसमें एक उदाहरण देते हैं—ध्वनिरूप शब्द से वाद्ययन्त्र की सिद्धि की तरह । जैसे पश्चात्काल में सिद्ध ध्वनिरूप शब्द से पूर्वसिद्ध वाद्ययन्त्र की सिद्धि का अनुमान होता है। यहाँ शब्द साधन है, वाद्ययन्त्र साध्य है। अनभिव्यक्त वाद्ययन्त्र का ध्वनि से अनुमान होता है। 'वीणा बज रही हैं' या 'वंशी बज रही हैं'—ऐसा हम ध्वनिविशेष सुनकर ही अनुमान करते हैं। इसी प्रकार पूर्वसिद्ध उपलब्धिविषय का पश्चात्सिद्ध उपलब्धिहेतु से ज्ञान होता है। यह एक उदाहरण दे दिया है। (२. १. ११) सूत्र में अवशिष्ट दोनों प्रकारों का भी इसी तरह उदाहरण समझ लेना चाहिये । उन दोनों का भी यहाँ फिर से व्याख्यान क्यों नहीं किया गया ? यहाँ पूर्वोक्त बात ही समझायी जा रही हैं, कोई नयी बात नहीं कही जा रही; फिर उसे यहाँ कह दिया या वहाँ कह लें, क्या नयी बात हो जायेगी ॥ १५ ॥ 'प्रमाण' तथा 'प्रमेय'—ये संज्ञायें संज्ञानिमत्त की स्थिति रहने पर व्यापकता रहती हैं। जैसे संज्ञानिमित्त 'प्रमाण' उपलब्धि-साधन है, तथा 'प्रमेय' उपलब्धि-विषय। परंतु जब १. 'त्रैकाल्ये'—इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri