न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
Page 11 of 410
Read in context[ ९ ] 'प्रदीपः सर्वविद्यानाम्, उपायः सर्वकर्मणाम् । आश्रयः सर्वधर्माणां, विद्योद्देशे प्रकीर्तिता' ॥ न्यायदर्शन का वर्ण्य विषय महर्षि गौतम का यह न्यायदर्शन एक वस्तुवादी दर्शन है। इस में प्रत्येक विषय का प्रतिपादन तर्क (युक्ति) द्वारा ही हुआ हैं। इस दर्शन के अनुसार चार प्रमाण हैं— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द । १. विषय का साक्षात् या अपरोक्ष ज्ञान 'प्रत्यक्ष' कहलाता है। यह विषय तथा इन्द्रिय के संयोग से उत्पन्न होता है। यह प्रत्यक्षज्ञान 'बाह्य' भी हो सकता है और 'आभ्यन्तर' भी। विषय का किसी इन्द्रिय से संयोग होने से जो प्रत्यक्ष होता हो वह 'बाह्य' प्रत्यक्ष तथा उसका केवल मन से संयोग हो तो 'आभ्यन्तर' कहलाता है। २. 'अनुमान' केवल इन्द्रिय द्वारा नहीं हो सकता, वह किसी ऐसे लिङ्ग या साधन के ज्ञान पर निर्भर करता है जिससे अनुमीयमान वस्तु या साध्य का एक नियत सम्बन्ध रहता है। इस नियत सम्बन्ध को हम 'व्याप्ति' कहते हैं। 'साध्य' उसे कहते हैं जिसका अस्तित्व पक्ष में सिद्ध करना हो। 'साधन' उसे कहते हैं जिसका साध्य के साथ नियत साहचर्य देखा गया हो तथा जो पक्ष में वर्तमान हो। साधारणतः अनुमान में कम से कम तीन लघु पद होते हैं। इनमें प्रथम 'पक्ष', द्वितीय 'साध्य' तथा तृतीय 'साधन' का बोधक होता है। जैसे यह अनुमान प्रयोग लें— 'पर्वत वह्निमान् है, धूमवान् होने से' । यहाँ पर्वत 'पक्ष' है, वह्नि 'साध्य' है तथा धूम 'साधन' है। ३. उपमान में संज्ञा तथा संज्ञी के सम्बन्ध का ज्ञान होता है। सादृश्यज्ञान द्वारा जो संज्ञा तथा संज्ञी का सम्बन्ध-ज्ञान होता है उसे 'उपमान' कहते हैं। उदाहरण के लिए-यदि 'गवय' की संज्ञा (नाम) हमें ज्ञात रहे तथा हम उसके आकार के विषय में भी यह जानते रहें कि वह गोसदृश होता है तो किसी दिन उसके सामने आने पर हम उसे पहचान सकते हैं कि वह गवय है। यह गवयज्ञान हमें 'उपमान' प्रमाण से होता है। ४. आप्त (विश्वसनीय) पुरुषों के उपदेश (कथन) से भी हमें अज्ञात विषयों के वारे में ज्ञान होता है। जैसे- राम, कृष्ण या अशोक, चन्द्रगुप्त आदि के वारे में हम प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं जानते कि वे कब हुए हैं; परन्तु ऐतिहासिकों ने जो कुछ उनके वारे में लिखा है उससे हम मानते हैं कि वे सब उक्त-उक्त समय में हुए थे। या हम नहीं जानते कि हरीतकी विबन्धघ्न है, परन्तु वैद्य के उपदेश से हम उसे खाते हैं और हमारा विबन्ध समाप्त हो जाता है। न्यायदर्शनकार इन चार प्रमाणों से अतिरिक्त किसी अन्य प्रमाण को नहीं मानते; अन्यमतावलम्बी दार्शनिकों द्वारा स्वीकृत अर्थापत्ति, अभाव-आदि को वे इन्हीं चारों में से किसी न किसी के अन्तर्गत सिद्ध करते हैं। इस न्यायदर्शन में इन विषयों को 'प्रमेय' (प्रमाणों से जानने योग्य) माना है— आत्मा, शरीर, इन्द्रिय, तथा इन्द्रियों के अर्थ (विषय), बुद्धि, मन, प्रवृत्ति, दोष, प्रेत्यभाव, CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri