BharatKosha
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

Page 110 of 410

Read in context
Page 110

९२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० तन्निवृत्तेर्वा प्रमाणसिद्धिवत् प्रमेयसिद्धिः ? ॥ १८ ॥ यदि प्रत्यक्षाद्युपलब्धौ प्रमाणान्तरं निवर्तते, आत्माद्युपलब्धावपि प्रमाणान्तरं निवत्स्य॑ते, अविशेषात् ? ॥ १८ ॥ एवं च सर्वप्रमाणविलोप इत्यत आह— न; प्रदीपप्रकाशवत् तत्सिद्धेः ॥ १९ ॥ यथा प्रदीपप्रकाशः प्रत्यक्षाङ्गत्वात् दृश्यदर्शने प्रमाणम्, स च प्रत्यक्षान्तरेण चक्षुषः सन्निकर्षेण गृह्यते। प्रदीपभावाभावयोर्दर्शनस्य तथाभावाद् दर्शनहेतुर- नुमीयते। 'तमसि प्रदीपमुपाददीथाः' इत्याप्तोपदेशेनापि प्रतिपद्यते। एवं प्रत्यक्षा- दीनां यथादर्शनं प्रत्यक्षादिभिरेवोपलब्धिः। इन्द्रियाणि तावत् स्वविषयग्रहणेनैवानुमीयन्ते। अर्थाः प्रत्यक्षतो गृह्यन्ते। इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्त्वावरणेन लिङ्गेनानुमीयन्ते। इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मसमवायाच्च सुखादिवद् गृह्यते। एवं उक्त प्रत्यक्षादि के ज्ञान में प्रमाणान्तर न मानने पर आत्मादि प्रमेय की सिद्धि में भी प्रमाणान्तर नहीं मानना पड़ेगा ? ॥ १८ ॥ यदि इस प्रत्यक्षादि ज्ञान में प्रमाणान्तर निवृत्त हो जाता है तो प्रमेय (आत्मा आदि) के ज्ञान में भी प्रमाणान्तर मानने की क्या आवश्यकता है; क्योंकि बात दोनों जगह बराबर है ? ॥ १८ ॥ इस तरह आपका 'सब प्रमाणों का प्रकरण' ही समाप्त हो जायेगा ? (इसका सिद्धान्ती उत्तर देते हैं— ) नहीं; प्रदीपप्रकाश की तरह उसकी सिद्धि हो जायेगी ॥ १९ ॥ जैसे—दीपक का प्रकाश प्रत्यक्ष का अङ्ग ( साधन ) होने से दृश्य को दिखाने में प्रमाण है, और वह प्रत्यक्षान्तर—चक्षुःसन्निकर्ष—से गृहीत होता है। तथा 'दीपक के रहते अन्धकार में दृश्य का दिखायी देना, और दीपक के न रहने पर दिखायी न देना—' इस व्यतिरेकव्याप्ति से दीपक में दर्शनहेतुत्व अनुमान प्रमाण से, तथा 'अन्धकार में दीपक का सहारा लेना चाहिये'—इस आप्तोपदेश से भी सिद्ध किया जा सकता है ! अतः सिद्ध हो गया कि दीपक की तरह प्रत्यक्षादि प्रमाणों का भी दर्शन के अनुसार उन्हीं प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ज्ञान हो जाता है। अतीन्द्रिय इन्द्रियों का स्वविषयग्रहणरूप हेतु से अनुमान होता है, अर्थों का प्रत्यक्ष होता है, इन्द्रिय और अर्थ का सम्बन्ध आवरण हेतु से अनुमित होता है, इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न ज्ञान भी सुखादि ज्ञान की तरह आत्मनःसंयोग, तथा आत्मा के साथ समवाय ( सम्बन्ध ) से होता है—इस प्रकार प्रमाणविशेष का विभागपूर्वक विवेचन करना CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित) · Page 110 of 410 · BharatKosha