न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context२०. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९५ प्रदीपप्रकाशः प्रमेयसाधनायोपादीयते, एवं प्रमाणसाधनायाप्युपादेयः; विशेष- हेत्वभावात् । सोऽयं विशेषहेतुपरिग्रहमन्तरेण दृष्टान्त एकस्मिन् पक्षे उपादेयो न प्रतिपक्ष इत्यनेकान्तः । एकस्मिंश्च पक्षे दृष्टान्त उपादेयो न प्रतिपक्षे दृष्टान्त इत्यनेकान्तः; विशेषहेत्वभावादिति । विशेषहेतुपरिग्रहे सति उपसंहाराभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः¹ । विशेषहेतुपरिगृही- तस्तु दृष्टान्त एकस्मिन् पक्षे उपसंह्रियमाणो न शक्योऽननुज्ञातुम् । एवं च सत्यनेकान्त इत्ययं प्रतिषेधो न भवति । प्रत्यक्षादीनां प्रत्यक्षादिभिरुपलब्धावनवस्थेति चेद् ? न; संविद्विषय- निमित्तानामुपलब्ध्या व्यवहारोपपत्तेः । प्रत्यक्षेणार्थमुपलभे, अनुमानेनार्थ- मुपलभे, उपमानेनार्थमुपलभे, आगमेनार्थमुपलभे इति, प्रत्यक्षं मे ज्ञानमानु- मानिकं मे ज्ञानमौपमानिकं मे ज्ञानमागम्रिकं मे ज्ञानमिति—संविद्विषयं संविन्निमित्तं चोपलभमानस्य धर्मार्थसुखापवर्गप्रयोजनस्तत्प्रत्यनीकपरिवर्जन- के लिए जैसे प्रदीपप्रकाश आवश्यक है, उसी प्रकार उन प्रमाणादि को जानने के लिये प्रमाणान्तर की आवश्यकता पड़ेगी ही—इस तरह विशेष हेतु के बिना ही परिगृहीत 'दृष्टान्त' एक ही पक्ष में उपादेय होता हैं, प्रतिपक्ष में नहीं—अतः अनैकान्तिक है । अर्थात् प्रमाणान्तर को न मानने में प्रदीपप्रकाश दृष्टान्त को लेना तथा स्थाल्यादि के रूपप्रकाश के लिये दूसरे प्रमाण की आवश्यकता में न लेना—यह इस हेतु में अनैकान्तिक दोष है; क्योंकि एक ही पक्ष का दृष्टान्त लेने में कोई विशेष हेतु नहीं है। यदि उपर्युक्त दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष का साधक कोई विशेष हेतु स्वीकार किया जाये तो उस पक्ष के दृष्टान्त के बल पर 'उपसंहार' (चतुर्थ अवयव) के स्वीकार होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा । तात्पर्य यह है कि विशेषहेतु से परिगृहीत दृष्टान्त एक पक्ष में उपसंहृत होता है तो इसमें आपको क्या आपत्ति है ! ऐसा मान लेने से आपका उठाया 'अनैकान्तिक' वाला प्रतिषेध भी नहीं बन सकेगा । प्रत्यक्षादि प्रमाणों की उन्हीं प्रत्यक्षादिकों से सिद्धि मानने से अनवस्था दोष होने लगेगा ? नहीं; क्योंकि ज्ञानविषय कारणों की उपलब्धि होने से सम्पूर्ण व्यवहार चलते देखे जाते हैं। 'प्रत्यक्ष द्वारा विषय को जानता हूँ' 'अनुमान द्वारा साध्य को जानता हूँ', 'उपमान से उपमेय को जानता हूँ' 'आगम (शब्द) द्वारा विषय को जानता हूँ'—ऐसा, या 'मेरा ज्ञान प्रत्यक्ष है' 'आनुमानिक है', औपमानिक है', 'शब्द है'—ऐसे ज्ञान, तथा ज्ञानविषय को जानने वाले पुरुष के धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के लिए तथा १. भाष्यमिदं सूत्रत्वेन क्वचिदुल्लिखितम् । प्रमाणं प्रमाणान्तरनिरपेक्षम्, प्रकाश- कत्वात्, प्रदीपवदिति विशेषहेतुपरिग्रहे सतीत्यर्थः ।