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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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१०८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० आहोस्वित् भिन्नार्थविषयेति ? अभिन्नार्थविषयेति चेद्, अर्थान्तरानुज्ञानादव- यविसिद्धिः। नानार्थविषयेति चेद्, भिन्नेष्वेकदर्शनानुपपत्तिः। अनेकस्मिन्नेक इति व्याहता बुद्धिर्न दृश्यत इति ॥ ३६॥ सेनावनवद् ग्रहणमिति चेन्नातीन्द्रियत्वादणूनाम् ॥ ३७ ॥ यथा सेनाङ्गेषु वनाङ्गेषु च दूरादगृह्यमाणपृथक्त्वेष्वेकमिदमित्युपपद्यते बुद्धिः, एवमणुषु सञ्चितेष्वगृह्यमाणपृथक्त्वेष्वेकमिदमित्युपपद्यते बुद्धिरिति ? यथा गृह्यमाणपृथक्त्वानां सेनावनाङ्गानामारात् कारणान्तरतः पृथक्त्वस्याग्रहणम्, यथा गृह्यमाणजातीनाम् ‘पलाश इति वा’, ‘खदिर इति वा’ नाराज्जाति- ग्रहणं भवति, यथा गृह्यमाणप्रस्पन्दानां ना रात् स्पन्दग्रहणम्, गृह्यमाणे चार्थजाते पृथक्त्वस्याग्रहणादेकमिति भाक्तः प्रत्ययो भवति; न त्वणूनामगृह्यमाण- पृथक्त्वानां कारणतः पृथक्त्वाग्रहणाद् भाक्त एकप्रत्ययोऽतीन्द्रियत्वादणूनामिति । पूछना चाहिए। क्या वह एकबुद्धि एकविषयक है, या नानार्थविषयक ? यदि एकार्थ- विषयक है तो अर्थान्तर की स्वीकृति से अवयवी की सिद्धि भी हो गयी। यदि वह नानार्थविषयक है तो अनेक में एक ज्ञान कैसे बनेगा ? ‘अनेक में एक’—यह विरोधी ज्ञान कहीं नहीं देखा गया ॥ ३६ ॥ सेना या वन की तरह अनेक में एक का ग्रहण हो जायेगा--ऐसा भी नहीं मान सकते; क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय हैं, उनका इन्द्रिय से सन्निकर्ष नहीं हो सकता ॥ ३७ ॥ जैसे सेना के अवयवों या वन के अवयवों में उनका पार्थक्य दूर से दिखायी न देने से अनेकों में एक बुद्धि हो जाती है, इसी तरह पार्थक्य से अगृहीत परमाणुसङ्घात में एकबुद्धि हो सकती है ? सेनाङ्ग या वनाङ्ग के पृथक्त्व का ग्रहण हो सकता है, परन्तु दूरतारूपी कारणान्तर से उस पृथक्त्व का ग्रहण नहीं होता, और जैसे पलाश आदि की जाति गृहीत हो सकती है कि ‘यह पलाश है’ या ‘यह खदिर है’, परन्तु दूरता के कारण उसका जातिग्रहण नहीं हो पाता, तथा समीप में चेष्टाओं का स्पन्दन गृहीत हो सकता है परन्तु दूरता के कारण नहीं हो पाता; ऐसे-ऐसे अर्थसमूह को जब गृहीत करते हैं तो उसके पार्थक्य के अगृहीत होने से उसमें औपचारिक एकबुद्धि हो जाती है। यही बात परमाणुओं के बारे में नहीं कह सकते; क्योंकि परमाणुओं का तो पृथक्त्व गृहीत नहीं होता। कारणवशात् उनके पृथक्त्व गृहीत नहीं हैं तो एकबुद्धि परमाणुपुञ्ज में कैसे बन सकती है; कारण, अणु. तो अतीन्द्रिय हैं।

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