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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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१२६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० जातिविशेषे चानियमात् ॥ ५७ ॥ सामयिकः शब्दार्थसम्प्रत्ययः, न स्वाभाविकः। ऋष्यार्यम्लेच्छानां यथा- कामं शब्दविनियोगोऽर्थप्रत्यायनाय प्रवर्त्तते। स्वाभाविके हि शब्दस्यार्थप्रत्याय- कत्वे यथाकामं न स्याद्, यथा-तैजसस्य प्रकाशस्य रूपप्रत्ययहेतुत्वं न जातिविशेषे व्यभिचरतीति ॥ ५७ ॥ (ख) शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् [ ५८-६९ ] पुत्रकामेष्टिहवनाभ्यासेषु— तदप्रामाण्यमनृतव्याघातपुनरुक्तदोषेभ्यः ? ॥ ५८ ॥ १. तस्येति शब्दविशेषमेवाधिकुरुते भगवान् ऋषिः। शब्दस्य प्रमाणत्वं न सम्भवति। कस्मात्? अनृतदोषात् पुत्रकामेष्टौ। 'पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत' इति नेष्टौ संस्थितायां पुत्रजन्म दृश्यते। दृष्टार्थस्य वाक्यस्यानृतत्वात् अदृष्टार्थ- मपि वाक्यम्—'अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः' इत्याद्यनृतमिति ज्ञायते। २. विहितव्याघातदोषाच्च—हवने 'उदिते होतव्यम्, अनुदिते होतव्यम्, समयाध्युषिते होतव्यम्' इति विधाय, विहितं व्याहन्ति—'श्यावोऽस्याहुति- मभ्यवहरति य उदिते जुहोति, शबलोऽस्याहुतिमभ्यवहरति योऽनुदिते जुहोति, जातिविशेष में नियम न होने से भी शब्दार्थ-सम्बन्ध सामयिक नहीं बनता ॥ ५७ ॥ शब्द से अर्थ का ज्ञान सांकेतिक है, न कि स्वाभाविक। ऋषि, आर्य तथा म्लेच्छ जन अर्थ-ज्ञान के लिये शब्दों का यथेच्छ आदान प्रदान करते हैं। यदि यह शब्दार्थ- सम्बन्ध स्वाभाविक होता तो उनका यथेच्छ प्रयोग न हो पाता। जैसे कि सूर्य आदि का प्रकाश रूपज्ञान का स्वाभाविक हेतु है, वह कहीं अन्यजातीय में व्यभिचरित नहीं होता ॥ ५७ ॥ पूर्वपक्ष—पुत्रकामयाग, हवन तथा अभ्यास में— मिथ्यात्व, विरोध तथा पुनरुक्ति दोष होने से शब्द में प्रामाण्य नहीं ॥ ५८ ॥ १. सूत्र में महर्षि ने 'तस्य' पद से शब्दविशेष का ग्रहण किया है। शब्द का प्रामाण्य सम्भव नहीं हैं; अनृत (= मिथ्या) दोष होने से, जैसे पुत्रकामेष्टि में। 'पुत्र की इच्छा रखने वाला पुरुष पुत्रकामयज्ञ करें'—यह वाक्य है, यहाँ यज्ञ के होते पुत्र जन्म नहीं दिखायी देता। यों जब उस वेद में दृष्टार्थक वाक्य ही मिथ्या है तो वहाँ के अदृष्टार्थक वाक्य—'स्वर्ग की इच्छा वाला अग्निहोत्र करें' में भी मिथ्यात्वकल्पना अनुमान से हो सकती है। २. विहित के विरोध से भी शब्द प्रमाण नहीं हैं। जैसे हवन-प्रसङ्ग में 'उदित (सूर्य के रेखामात्र उदय होने पर) में हवन करे, अनुदित (रात्रि का सोलहवां भाग, जिसमें तारागण अस्त न हुए हों) में हवन करे, समयाध्युषित (प्रभात का वह समय जिसमें तारागण अस्त हो चुका हो, परन्तु सूर्योदय न हुआ हो) में हवन करें'—यह विघानकर CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri