न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context६३. सू० ] . शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १२९ जुहोति, तत्रायमभ्युपगतकालभेदे दोष उच्यते—'श्यावोऽस्याहुतिमभ्यवहरति य उदिते जुहोति'; तदिदं विधिभ्रंशे निन्दावचनमिति ॥ ६० ॥ अनुवादोपपत्तेश्च ॥ ६१ ॥ पुनरुक्तदोषोऽभ्यासे नेति प्रकृतम् । अनर्थकोऽभ्यासः = पुनरुक्तम्, अर्थ- वानभ्यासः = अनुवादः । योऽयमभ्यासः 'त्रिःप्रथमामन्वाह त्रिरुत्तमाम्' इत्यनुवाद उपपद्यते; अर्थवत्त्वात् । त्रिवंचनेन हि प्रथमोत्तमयोः पञ्चदशत्वं सामिधेनीनां भवति । तथा च मन्त्राभिवादः१—'इदमहं भ्रातृव्यं पञ्चदशावरेण वाग्वज्रेण बाधे योऽस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः' इति पञ्चदशसामिधेनीर्वज्रं मन्त्रो- ऽभिवदति, तदभ्यासमन्तरेण न स्यादिति ॥ ६१ ॥ वाक्यविभागस्य चार्थग्रहणात् ॥ ६२ ॥ प्रमाणं शब्दो यथा लोके ॥ ६२ ॥ विभागश्च ब्राह्मणवाक्यानां त्रिविधः— विध्यर्थवादानुवादवचनविनियोगात् ॥ ६३ ॥ इसकी आहुति को खा डालता है जो उदित समय में हवन करता है'—यह विधिभ्रंश में निन्दापरक श्रुति है । इससे वचनव्याघात नहीं होता ( अतः यह वचनव्याघात शब्दा- प्रामाण्य में हेतु नहीं कहा जा सकता ) ॥ ६० ॥ अनुवादोपपादन होने से ( भी पुनरुक्त दोष नहीं है ) ॥ ६१ ॥ अभ्यास में पुनरुक्त दोष नहीं है—यह प्रसङ्ग चल रहा है। निरर्थक अभ्यास ( आवृत्ति ) पुनरुक्त होता है, परन्तु सार्थक अभ्यास अनुवाद कहलाता है । 'प्रथम की तीन आवृत्ति तथा अन्तिम की तीन आवृत्ति करे'—इस श्रुति में यह अभ्यास सार्थक होने से अनुवाद है; क्योंकि प्रथम तथा अन्तिम के त्रिरावर्तन से सामिधेनियों में पञ्चदशत्व सिद्ध हो पायेगा । जैसा कि मन्त्राभिवाद है—'मैं इस पञ्चदश सामिधेनीरूप वाग्वज्र से शत्रु को मारूँगा, जो हमसे द्वेष करता है, या जिससे हम द्वेष करते हैं।' यहाँ पञ्चदश सामिधेनीरूप वाग्वज्र का मन्त्र अभिवदन कर रहा है । यह पञ्चदशत्व एकादश सामि- धेनियों में आवृत्ति के बिना नहीं बन सकता । अतः अनुवाद सार्थक है ॥ ६१ ॥ वाक्यविभाग के अर्थवान् होने से भी शब्द प्रमाण है ॥ ६२ ॥ शब्द ( वेद-वाक्य ) प्रमाण है, सार्थक विभागवान् होने से, जैसे—लोक में (मन्त्रा- दिवाक्य ) ॥ ६२ ॥ ब्राह्मणवाक्यों का विभाग तीन प्रकार का है— १. विधि वचन २. अर्थवाद वचन तथा ३. अनुवाद वचन—यों विनियोग होने से ॥ ६३ ॥ १. अभि मुख्याय कर्मणे प्रवृत्तये वादो वाक्यमित्यर्थः ।