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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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६९. सू० ] शब्दविशेषपरीक्षाप्रकरणम् १३५ द्रष्टृप्रवक्तृसामान्याच्चानुमानम्। य एवाप्ता वेदार्थानां द्रष्टारः प्रवक्तारश्च त एवायुर्वेदप्रभृतीनाम्-इत्यायुर्वेदप्रामाण्यवद् वेदप्रामाण्यमनुमातव्यमिति। नित्यत्वाद् वेदवाक्यानां प्रमाणत्वे तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यादित्ययुक्तम्। शब्दस्य वाचकत्वादर्थप्रतिपत्तौ प्रमाणत्वं न; नित्यत्वात्। नित्यत्वे हि सर्वस्य सर्वेण वचनाच्छब्दार्थव्यवस्थानुपपत्तिः। नानित्यत्वे वाचकत्वमिति चेद्, न; लौकिकेष्वदर्शनात्। तेऽपि नित्या इति चेद्, न; अनाप्तोपदेशादर्थविसंवादोऽनु- पपन्नः। नित्यत्वाद्वि शब्दः प्रमाणमिति। अनित्यः स इति चेत् ? अविशेष- वचनम्। अनाप्तोपदेशो लौकिको न नित्य इति कारणं वाच्यमिति ! यथानियोगं चार्थस्य प्रत्यायनाद् नामधेयशब्दानां लोके प्रामाण्यं नित्यत्वात् प्रामाण्यानुपपत्तिः। यत्रार्थे नामधेयशब्दो नियुज्यते लोके, तस्य नियोगसामर्थ्यात् प्रत्यायको भवति; न नित्यत्वात्। मन्वन्तरयुगान्तरेषु चातीतानागतेषु सम्प्रदायाभ्यासप्रयोगाविच्छेदो वेदानां द्रष्टा तथा प्रवक्ता के उभयत्र समान होने से भी उस अदृष्टार्थ में प्रामाण्य का अनुमान कर लेना चाहिये। जो आप्त पुरुष वेदमन्त्रों के द्रष्टा तथा प्रवक्ता हैं, वे ही आयुर्वेद आदि के प्रवक्ता हैं, जब उनसे उपदिष्ट आयुर्वेदादि सत्य हैं तो उन्हीं द्वारा उपदिष्ट वेदमन्त्र भी सत्य होने चाहिये—यों अनुमान करना चाहिये। वेदवाक्यों के नित्य होने से ही उनमें प्रामाण्य है, फिर यहां उन्हें आप्तोपदेश मान कर उनमें प्रामाण्य सिद्ध करना अनुचित है? (तथा परस्परविरोधी भी है, क्योंकि जो नित्य है वह आप्तोपदिष्ट क्यों कर होगा?) शब्द का वाचत्व (संकेत से बोधकत्व) हेतु से अर्थप्रतिपादन में प्रामाण्य है, न कि नित्यत्व हेतु से। केवल नित्यत्व मानने पर सबका सबसे ज्ञान होने से शब्द-अर्थ की 'इस शब्द का यह अर्थ है'—यह व्यवस्था नहीं बनेगीं। अनित्य मानने पर उसमें वाचकत्व न बनें—ऐसी बात भी नहीं; क्योंकि अनित्य लौकिक शब्दों में भी अर्थ देखा जाता है, नित्यत्व नहीं। उन लौकिक शब्दों को भी नित्य मान लेने पर, उनमें से कुछ के अनाप्तोपदेश होने से जो अर्थवैपरीत्य देखा जाता है, वह अनुपपन्न होने लगेगा; क्योंकि नित्य होने से ही शब्द प्रमाण है! अनाप्तोद्दिष्ट 'शब्द अनित्य हैं' यह वचन तो लौकिक यथार्थ प्राकृत शब्दों में भी संगत हो सकता है। लौकिक अनाप्तोपदेश ही अनित्य मानना है तो उसमें कोई हेतु दिखाना चाहिये। शब्द के साथ यथासंकेत अर्थ-ज्ञान होने से संज्ञाशब्दों का लोक में प्रामाण्य है। नित्यत्व के रहने से प्रामाण्य नहीं बनता। एवं च—लौकिक शब्द जिस अर्थ में संकेतित है, उसका वह ज्ञान करा देता है, न कि नित्य होने से ज्ञान कराता है। अतीतानागत मन्वन्तर-युगान्तर में सम्प्रदायाभ्यास-प्रयोग से उनका निरन्तर बना