न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ० अनुपलब्भादप्यनुपलब्धिसद्भावान्नावरणानुपपत्तिरनुपलम्भात् ? ॥ २० ॥ यथाऽनुपलभ्यमानाप्यावरणानुपलब्धिरस्ति, एवमनुपलभ्यमानमप्यावरण- मस्तीति । यद्यभ्यनुजानाति भवान्—अनुपलभ्यमानावराणानुपलब्धिरस्तीति, अभ्यनुज्ञाय च वदति—नास्त्यावरणमनुपलम्भादित्येतद् । एतस्मिन्नप्यभ्यनुज्ञावादे प्रतिपत्तिनियमो नोपपद्यत इति ? ॥ २० ॥ अनुपलब्भात्मकत्वादनुपलब्धेरहेतुः ॥ २१ ॥ यदुपलभ्यते तदस्ति, यन्नोपलभ्यते तन्नास्ति, इति अनुपलब्भात्मकमस- दिति व्यवस्थितम् । उपलब्ध्याभावश्च—अनुपलब्धिरिति । सेयमभावत्वान्नोप- लभ्यते । सच्च खल्वावरणम् तस्योपलब्ध्या भवितव्यम्, न चोपलभ्यते, तस्मान्ना- स्तीति । तत्र यदुक्तम्—‘नावरणानुपपत्तिरनुपलम्भात्’ इति अयुक्तमिति ॥ २१ ॥ अथ शब्दस्य नित्यत्वं प्रतिजानानः कस्माद्धेतोः प्रतिजानीते ? अस्पर्शत्वात् ? ॥ २२ ॥ अस्पर्शमाकाशं नित्यं दृष्टमिति, तथा च शब्द इति ? ॥ २२ ॥ सोऽयमुभयतः सव्यभिचारः—स्पर्शवांश्चाणुर्नित्यः, अस्पर्शं च कर्मानित्यं अनुपलब्भ से अनुपलब्धि होने के कारण आवरणानुपलब्धि अनुपलब्भ से नहीं मान सकते ? ॥ २० ॥ जैसे आवरणानुपलब्धि अनुपलभ्यमान होते हुए भी है, वैसे ही आवरण होते हुए भी वह अनुपलभ्यमान भी है ? हमारा मतलब है कि यदि आप यह स्वीकार करते हैं कि अनुपलम्यमान भी आवरणत्वानुपलब्धि हैं, तो यह स्वीकार करके ही आप यह भी कहते हैं कि—अनुपलम्भ से आवरण नहीं है, तो इस अभ्यनुज्ञावाद का प्रतिपादन ठीक नहीं हुआ ? ॥ २० ॥ अनुपलब्भात्मक होने से अनुपलब्धि का वह अहेतु है ॥ २१ ॥ जो उपलब्ध है वह है, जो उपलब्ध नहीं है वह नहीं है, तो अनुपलब्भात्मक द्रव्य असत् है—यह निश्चित हो गया । उपलब्ध्याभाव को अनुपलब्धि कहते हैं । यह अभाव के कारण उपलब्ध नहीं होता । सत् आवरण है । वह होता तो उसकी उपलब्धि होती; वह उपलब्ध नहीं हैं, अतः वह नहीं है । ऐसी स्थिति में, तुम्हारा ‘अनुपलम्भ से आवरण की अनुपपत्ति नहीं होती’—यह कथन ही अयुक्त है, हमारा पक्ष नहीं ॥ २१ ॥ शब्द की नित्यता किस हेतु से प्रतिज्ञात करते हो ? क्या अस्पर्शवत्त्व होने से ? ॥ २२ ॥ अस्पर्शवान् आकाश नित्य देखा गया है, उसी तरह का यह शब्द है ? ॥ २२ ॥ अन्वय-व्यतिरेक से शब्द के नित्यत्व में अस्पर्शवत्त्व हेतु व्यभिचारी है; क्योंकि