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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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८. सू० ] चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८१ न तमन्तरेणेति । तस्य वधः, उपघातः, पीडा, प्रमापणं वा = हिंसा, न नित्यत्वे- नात्मोच्छेदः। तत्र यदुक्तम्—'तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात्', एतन्नेति ॥ ६ ॥ प्रासङ्गिकं चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् [ ७-१४ ] २. इतश्च देहादिव्यतिरिक्त आत्मा; सव्यदृष्टस्येतरेण प्रत्यभिज्ञानात् ॥ ७ ॥ पूर्वपरयोर्विज्ञानयोरेकविषये प्रतिसन्धिज्ञानं प्रत्यभिज्ञानम्—'तमेवैतर्हि पश्यामि यमज्ञासिषं स एवायमर्थः' इति, सव्येन चक्षुषा दृष्टस्येतरेणापि चक्षुषा प्रत्यभिज्ञानाद् 'यमद्राक्षं तमेवैतर्हि पश्यामि' इति । इन्द्रियचैतन्ये तु नान्यदृष्ट- मन्यः प्रत्यभिजानातीति प्रत्यभिज्ञानुपपत्तिः । अस्ति त्विदं प्रत्यभिज्ञानम्, तस्मा- दिन्द्रियव्यतिरिक्तश्चेतनः ॥ ७ ॥ नैकस्मिन्नासास्थिव्यवहिते द्वित्वाभिमानात् ? ॥ ८ ॥ एकमिदं चक्षुर्मध्ये नासास्थिव्यवहितम्, तस्यान्तौ गृह्यमाणौ द्वित्वाभिमानं प्रयोजयतो मध्यव्यवहितस्य दीर्घस्येव ? ॥ ८ ॥ अतः वही ( देहेन्द्रियसंधात ) कर्ता है, उक्त संवेदन की निवृत्ति तन्निमित्तक ही है, न कि उसके बिना । अतः उस देहेन्द्रियसंधात का वध = उपघात, पीड़ा, हिंसा, प्रमापण ( प्राणवियोजन ) बन सकता है । नित्य आत्मा का उच्छेद नहीं बनता । यों, 'सात्मक शरीर के प्रदाह में पातक नहीं होता'—यह पूर्वपक्षी का कथन अयुक्तियुक्त ही है॥६॥ २. इस कारण भी आत्मा देहादि से व्यतिरिक्त है— वाम चक्षु द्वारा देखे गये का दक्षिण चक्षु से प्रत्यभिज्ञान होने के कारण ॥ ७ ॥ पूर्व, पर के विज्ञान का एक विषय में प्रतिसन्धिज्ञान 'प्रत्यभिज्ञान' कहलाता है । जैसे—'अब मैं उसी अर्थ को देख रहा हूँ, जिसे मैंने पहले जान लिया था, यह वही विषय है' । वायीं आँख द्वारा देखे गये का दूसरी (दाहिनी) आँख द्वारा 'जिसको मैंने पहले देखा था अब उसीको देख रहा हूँ'—ऐसा प्रत्यभिज्ञान होने से । इन्द्रियचैतन्य मानने पर इन्द्रियों में भिन्नत्व होने से अन्य इन्द्रिय द्वारा दृष्ट का अन्य इन्द्रिय प्रत्यभिज्ञान नहीं कर सकती अतः, उक्त प्रत्यभिज्ञान नहीं बनेगा । जब कि यह प्रत्यभिज्ञान होता है, अतः यह सिद्ध है कि चेतन इन्द्रियों से व्यतिरिक्त है ॥ ७ ॥ उक्त प्रत्यभिज्ञान वास्तविक नहीं; अपितु एक चक्षुरिन्द्रिय में नासास्थि के व्यवधान से द्वित्व का भ्रम हो जाता है ? ॥ ८ ॥ यह एक ही चक्षु, बीच में नासास्थि ( नाक की हड्डी ) के व्यवधान से उस की दोनों कोटियों ( अन्तों ) के गृह्यमाण होने के कारण दो की तरह प्रमाता द्वारा प्रमित होता है, जैसे—एक ही लम्बे बाँस के मध्यभाग को लेकर दो किनारों की कल्पना कर लेते हैं ? ॥ ८ ॥

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