न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१३. सू० ] । चक्षुरद्वैतपरीक्षाप्रकरणम् १८४ अथ वा, एकविनाशस्यानियमाद् द्वाविमावर्थौ, तौ च पृथगावरणोपघातौ अनुमीयेते—विभिन्नाविति । अवपीडनाच्चैकस्य चक्षुषो रश्मिविषयसन्निकर्षस्य भेदाद् दृश्यभेद इव गृह्यते, तच्चैकत्वे विरुध्यते । अवपीडननिवृत्तौ चाभिन्नप्रतिसन्धानमिति । तस्मा- देकस्य व्यवधानानुपपत्तिः ॥ ११ ॥ ३. अनुमीयते चायं देहादिसङ्घातव्यतिरिक्तश्चेतन इति; इन्द्रियान्तरविकारात् ॥ १२ ॥ कस्यचिदम्लफलस्य गृहीततद्रससाहचर्ये रूपे गन्धे वा केनचिदिन्द्रियेण गृह्यमाणे रसनस्येन्द्रियान्तरस्य विकारो रसानुस्मृतौ रसगद्ध्प्रिवृत्तितोदन्तोदक- सम्प्लवभूतो गृह्यते । तस्येन्द्रियचैतन्येऽनुपपत्तिः, नान्यदृष्टमन्यः स्मरति ॥१२॥ न; स्मृतेः स्मर्त्तव्यविषयत्वात् ? ॥ १३ ॥ स्मृतिर्नाम धर्मो निमित्तादुत्पद्यते, तस्याः स्मर्त्तव्यो विषयः, तत्कृत इन्द्रिया- चक्षु के दो छिद्र (गड्ढे) अलग-अलग देखे जाते हैं । चक्षु के एक मानने पर, नासास्थि के व्यवधान से ये दो छिद्र कैसे होते ! अथवा—'एक का विनाश दूसरे की स्थिति या विनाश का नियामक नहीं होता' इस सिद्धान्त से ये चक्षु दो हैं, इन दोनों के अपने पृथक्-पृथक् आवरण और विनाश हैं, अतः अनुमान होता है कि ये दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। एक आंख को अंगुली से अवपीड़ित करने (कौंचने) पर उसी एक के रश्मिविषयक सन्निकर्ष का भेद होने से सीमित मात्रा में दृश्यभेद (एक चांद के दो चांद दिखायी देना आदि) दिखायी देता है, अवपीडन के निवृत्त होने पर वह भेद भी निवृत्त हो जाता है— यह बात चक्षु के एकत्वसिद्धान्त में कैसे बनेगी । अतः एक में व्यवधानहेतु अनुपपन्न ही है ॥ ११ ॥ ३. इसलिए भी इस आत्मा का देहादिसङ्घात से पार्थक्य अनुमित होता है— इन्द्रियान्तर में विकार होने से ॥ १२ ॥ किसी आम-इत्यादि खट्टे फल का पहले से रससाहचर्य गृहीत होने पर, किसी अन्य इन्द्रिय द्वारा रूप या गन्ध के जान लेने के बाद इसकी अनुस्मृति होने पर दूसरी इन्द्रिय रसना में अम्लरस की तृष्णा से जनित विकार (मुंह में पानी भर आना) देखा जाता है । यह बात, इन्द्रियचैतन्य मानने पर कैसे बनेगी; क्योंकि अन्य द्वारा देखे गये का अन्य कैसे स्मरण कर सकता है ! ॥ १२ ॥ शङ्का— स्मृति के स्मर्त्तव्यविषयक होने से उससे आत्मा का पार्थक्य सिद्ध नहीं होता ॥१३॥ स्मृति नामक धर्म अपने संस्कारकारण से उत्पन्न होता है, स्मर्त्तव्य उसका विषय है । उक्त इन्द्रियान्तरविकार तत्स्मृतिप्रयुक्त है, आत्मकृत नहीं ? ॥ १३ ॥