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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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१९६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० च प्रकृतिभावे भूतानां धर्मोपलब्धिरसति च संयोगाप्रतिषेधात् सन्निहितानामिति । यथा स्थाल्यामुदकतेजोवाय्वाकाशानामिति । तदिदमनेकभूतप्रकृति शरीरमगन्ध- मरसमरूपमस्पर्शं च प्रकृत्यनुविधानात् स्यात् । न त्विदमित्थम्भूतम्, तस्मात् ‘पार्थिवं गुणान्तरोपलब्धेः’ ॥ २८-३० ॥ श्रुतिप्रामाण्याच्च ॥ ३१ ॥ ‘सूर्यं ते चक्षुर्गच्छतात्’ इत्यत्र मन्त्रे ‘पृथिवीं ते शरीरम्’ इति श्रूयते, तदिदं प्रकृतौ विकारस्य प्रलयाभिधानमिति । ‘सूर्यं ते चक्षुः स्पृणोमि’ इत्यत्र मन्त्रान्तरे ‘पृथिवीं ते शरीरं स्पृणोमि’ इति श्रूयते, सेयं कारणाद्विकारस्य सृष्टिर- भिधीयत इति । स्थाल्यादिषु च तुल्यजातीयानामेककार्यारम्भदर्शनाद् भिन्न- जातीयानामेककार्यारम्भानुपपत्तिः ॥ ३१ ॥ इन्द्रियपरीक्षाप्रकरणम् [ ३२-५१ ] अथेदानीमिन्द्रियाणि प्रमेयक्रमेण विचार्यन्ते—किमाव्यक्तिकानि ? आहो- स्विद् भौतिकानीति ? उपलब्धि बन सकती है; अथवा—परस्पर संयुक्त भूतों का संयोग के अप्रतिषेध से भी गुणों को उपलब्धि हो सकती है । जैसे—एक ही स्थाली पार्थिव होती हुई भी वह्नि- संयुक्त हो तो अन्न को पका देती है, उदकसंयुक्त हो तो मध्यपाती पदार्थों को आर्द्र कर देती है, वायुसंयुक्त हो तो मध्यपाती पदार्थों का सञ्चरण करती है, आकाशसंयुक्त हो तो अन्य भूतों के कर्मों को इतस्ततः सञ्चरण के लिये अवकाश देती है । यह मानव शरीर यदि अनेकभूतप्रकृतिक होता तो तत्तद्भूतों को प्रकृति के अनुसार दूसरे के गुण दूसरे में नहीं आ सकते, अतः शरीर निर्गन्ध, नीरस, नीरूप, निःस्पर्श होता; परन्तु यह ऐसा नहीं है, अतः सिद्ध होता है कि—'इसमें गुणविशेष की विशेषोपलब्धि होने से यह पार्थिव है' ॥ २८-३० ॥ श्रुतिप्रामाण्य से भी ( मानव शरीर पार्थिव है ) ॥ ३१ ॥ 'तुम्हारे ( प्रेतात्मा के ) चक्षु सूर्य ( तेजस् ) में विलीन हो जायें' इस मन्त्र में 'तुम्हारा शरीर पृथ्वी में विलीन हो जाये'—इस प्रकार पृथ्वी प्रकृति में उसके विकार का विलय बतलाया है । 'तेरे लिये सूर्य को चक्षु रूप से सृजन करता हूँ' इस दूसरे मन्त्र में—'पृथ्वी को तेरे शरीर रूप में सृजन करता हूँ' यह कहते सुना जाता है! इसमें कारण से पृथ्वी के विकार की सृष्टि कही गयी है । स्थाल्यादि द्रव्यों में तुल्यजातियों का समान कार्य होता हुआ देखा जाता है; अतः भिन्नजातियों का समान कार्यारम्भ शरीर में अनुपपन्न है ॥ ३१ ॥ प्रमेयक्रम से, अब इन्द्रियों पर विचार किया जा रहा है—क्या ये इन्द्रियाँ सांख्य- मतानुसार अव्यक्त की विकार हैं ? या ( नैयायिकतानुसार ) भूतविकार हैं ?

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