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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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२०० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० इति । दृष्टश्च तेजसो धर्मभेदः—उद्भूतरूपस्पर्शं प्रत्यक्षं तेजः, यथा-आदित्य- रश्मयः; उद्भूतरूपमनुद्भूतस्पर्शं च प्रत्यक्षं तेजः, यथा-प्रदीपरश्मयः; उद्भूत- स्पर्शमनुद्भूतरूपमप्रत्यक्षम्, यथा-अवादिसंयुक्तं तेजः। अनुद्भूतरूपस्पर्शोऽ- प्रत्यक्षश्चाक्षुषो रश्मिरिति ॥ ३८ ॥ कर्मकारितश्चेन्द्रियाणां व्यूहः पुरुषार्थतन्त्रः ॥ ३९ ॥ यथा चेतनस्यार्थो विषयोपलब्धिभूतः सुखदुःखोपलब्धिभूतश्च कल्प्यते, तथेन्द्रियाणि व्यूढानि, विषयप्राप्त्यर्थश्च रश्मेश्चाक्षुषस्य व्यूहः । रूपस्पर्शानिभि- व्यक्तिश्च व्यवहारप्रवृत्त्यर्था१ द्रव्यविशेषे च प्रतिघातादावरणोपपत्तिर्व्यवहा- रार्था। सर्वद्रव्याणां विश्वरूपो व्यूह इन्द्रियवत् कर्मकारितः पुरुषार्थतन्त्रः । कर्म तु धर्माधर्मभूतं चेतनस्योपभोगार्थमिति । अव्यभिचाराच्च प्रतिघातो भौतिकधर्मः२ । यश्चावरणोपलम्भादिन्द्रियस्य द्रव्यविशेषे प्रतिघातः स भौतिकधर्मो न भूतानि अद्भूतरूपस्पर्श वाला प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है, जैसे—सूर्य की किरणें । उद्भूतरूप तथा अनुद्भूतस्पर्श वाला तेज प्रत्यक्षतः उपलब्ध होता है, जैसे—दीपक की लो । परन्तु वही उद्भूतस्पर्श तथा अनुद्भूतरूप वाला होता हुआ प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होता, जैसे जलादिसंयुक्त तेज । इस नय से चाक्षुष रश्मि ( कनीनिका ) अनुद्भूतरूपस्पर्श वाली होती हुई प्रत्यक्षतः उपलब्ध नहीं होती ॥ ३८ ॥ कर्म से प्रेरित यह इन्द्रियों की रचना उपभोग की साधिका है ॥ ३९ ॥ जिस प्रकार चेतन के अभीप्सित या जिहासित अर्थ सुख दुःख उसके हेतु हैं, उसी प्रकार चेतन के लिये सुखदुःखोपलब्धिरूप विषयोपलब्धि की कल्पना की जाती है, उसी चेतन के लिये ये इन्द्रियाँ भी रची गयी हैं। विषयसंयोग के लिये चाक्षुषरश्मि की रचना की गयी है । रूप या स्पर्श का अनुभूतत्व व्यवहारप्रवृत्ति के लिये है । द्रव्य-विशेष में गतिनिरोधक संयोग से चक्षु की आवरणोपपत्ति भी व्यवहार के लिये है । सभी द्रव्यों की विश्व के रूप में विचित्र रूपरचना इन्द्रियों की तरह ही कर्मप्रेरित है, यह रचना पुरुषार्थ- साधिका है । तथा कर्म धर्माधर्म रूप से चेतन के उपभोग के लिये है । व्यभिचार न होने से यह गतिनिरोधक संयोग होना भौतिक धर्म माना गया है । जो यह आवरण की उपलब्धि से इन्द्रिय का द्रव्यविशेष में गतिनिरोधक संयोग है, वह १. ०प्रक्लृप्त्यर्था—इति पाठ० । २. केविट्टीकाकाराः सूत्रकारीयं सूत्रमिदं मन्यन्ते । वस्तुतस्तु भाष्यकारीयमेवेदं सूत्रम्; न्यायसूचीनिबन्धेऽदृष्टत्वात् । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri