न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context२०४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० स्फटिकान्तरितोपलब्धिः, सा ज्ञापयति—अप्राप्यकारीणीन्द्रियाणि, अत एवा- भौतिकानि । प्राप्यकारित्वं हि भौतिकधर्म इति ॥ ४५ ॥ कुड्यान्तरितानुपलब्धेरप्रतिषेधः ॥ ४६ ॥ अप्राप्यकारित्वे सतीन्द्रियाणां कुड्यान्तरितस्यानुपलब्धिर्न स्यात् ॥ ४६ ॥ प्राप्यकारित्वेऽपि तु काचाभ्रपटलस्फटिकान्तरितोपलब्धिर्न स्यात् ? अप्रतिघातात् सन्निकर्षोपपत्तिः ॥ ४७ ॥ न च काचः, अभ्रपलं वा नयनरश्मि विष्टभ्नाति, सोऽप्रतिहन्यमानः सन्निन- कृष्टयत इति ॥ ४७ ॥ यश्च मन्यते—न भौतिकस्याप्रतिघात इति ? तन्न; आदित्यरश्मेः स्फटिकान्तरितेऽपि दाह्येऽविघातात् ॥ ४८ ॥ आदित्यरश्मेरविघातात्, स्फटिकान्तरितेऽप्यविघातात्, दाह्येऽविघातात् । अविघातादिति च पदाभिसम्बन्धाद् वाक्यभेद इति । प्रतिवाक्यं¹ चार्थभेद इति । आदित्यरश्मिः कुम्भादिषु न प्रतिहन्यते; अविघातात् कुम्भस्थमुदकं तपति, उपलब्धि देखी जाती है, अतः वह सिद्ध करती है कि इन्द्रियां अप्राप्य का ज्ञान कराने वाली हैं। अतएव ये अभौतिक भी हैं, क्योंकि प्राप्त का ज्ञान कराना भौतिक धर्म हैं ? ॥ ४५ ॥ कुड्यादि के व्यवधान द्वारा अनुपलब्धि हेतु से प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ४६ ॥ इन्द्रियों को अप्राप्यकारित्व मानने पर कुड्यादि से व्यवहित की अनुपलब्धि नहीं बनेगी ॥ ४६ ॥ प्राप्यकारित्व मानने पर भी तो काच, अभ्रपटल, स्फटिकादि से व्यवहित की उप- लब्धि नहीं होगी ? अप्रतिघात ( गत्यनिरोध ) से सन्निकर्षोपलब्धि हो जायगी ॥ ४७ ॥ काच या अभ्रपटल चक्षूरश्मि की गति में अवरोध नहीं करते । अतः वह अनिरुद्ध होती हुई अर्थ से सन्निकृष्ट हो जाती है ॥ ४७ ॥ जो यह मानता है—'भौतिक का गत्यनिरोध नहीं होता', यह उचित नहीं; आदित्यरश्मि के स्फटिक से व्यवहित होने पर भी दाह्यकर्म में गतिनिरोध न होने से ॥ ४८ ॥ . इस सूत्र में 'अविघातात्' इस पद के अभिसम्बन्ध से आदित्यरश्मि के अविघात से, स्फटिक के अविघात से, दाह्य में अविघात से—ये तीन वाक्य हैं। वाक्यों के अनुसार ही तीन अर्थ हैं। आदित्यरश्मि घटादिक में निरुद्ध नहीं होतीं, अविघात होने से। क्योंकि १. 'यथावाक्यम्'—इति पाठ० ।