न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
Page 234 of 410
Read in context२१६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० कथं तह्य॑नेकगुणानि भूतानि गृह्यन्त इति ? संसर्गाच्चानेकगुणग्रहणम् । अबादिंससर्गाच्च पृथिव्यां रसादयो गृह्यन्ते । एवं शेषेष्वपीति ? ॥ ६५ ॥ नियमस्तर्हि न प्राप्नोति, संसर्गस्यानियमाच्चतुर्गुणा पृथिवी, त्रिगुणा आपः, द्विगुणं तेजः, एकगुणो वायुरिति ? नियमश्चोपपद्यते, कथम् ? विष्टं ह्यपरं परेण ? ॥ ६६ ॥ पृथिव्यादीनां पूर्वपूर्वमुत्तरेणोत्तरेण विष्टम्, अतः संसर्गनियम इति । तच्चैतद् भूतसृष्टौ वेदितव्यम्, नैतर्हीति ? ॥ ६६ ॥ न, पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् ॥ ६७ ॥ नेति त्रिसूत्रीं प्रत्याचष्टे । कस्मात् ? पार्थिवस्य द्रव्यस्याप्यस्य च प्रत्यक्षत्वात् । 'महत्त्वानेकद्रव्यत्वाद्रूपाच्चोपलब्धिः' (वै. सू. ४.१.६) इति तैजसमेव द्रव्यं प्रत्यक्षं स्यात्, न पार्थिवमाप्यं वा; रूपाभावात् । तैजसवत्तु पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् न सिद्धान्ती—अनेक गुणवाले भूतों का ग्रहण कैसे होता है ? पूर्वपक्षी—सम्बन्ध से अनेक गुणों का ग्रहण हो जायेगा। जलादि के सम्बन्ध से पृथ्वी में रसादि गृहीत हो जाते हैं। इसी तरह अवशिष्ट के बारे में भी समझ लेना चाहिये ॥ ६५ ॥ सिद्धान्ती—तब-तो एक-एक वाला नियम बन नहीं पायगा जलादि संसर्ग का नियम न होने से यह कैसे बनेगा कि पृथ्वी में चार गुण ( विषय ) होते हैं, जल में तीन गुण होते हैं, तेज में दो गुण होते हैं, वायु में एक गुण होता है ? पूर्वपक्षी—नियम भी उपपन्न हो सकता है। कैसे ? पृथिव्यादि अबादि से सम्बद्ध है ? ॥ ६६ ॥ पृथिवी-आदि में पहला पहला भूत, अपने उत्तर उत्तर भूत से सम्बद्ध है। अतः सम्बन्ध से नियम बन सकता है। यह नियम विषयभूतसृष्ट्यादि के प्रतिपादक पुराणादि ग्रन्थों में स्पष्ट प्रतिपादित है, भले ही आज हम लोगों के ध्यान में न आवें ? ॥ ६६ ॥ इस मत का नैयायिक प्रत्याख्यान करते हैं— पार्थिव और आप्य द्रव्य के प्रत्यक्ष होने से ( एकगुणवान् नहीं हैं ) ॥ ६७ ॥ 'न' इस पद से सूत्रकार पूर्वोक्त त्रिसूत्री से प्रतिपादित विषय का प्रत्याख्यान करते हैं। कैसे ? पार्थिव और आप्य द्रव्य के प्रत्यक्ष होने से । तब तो महत्त्व से, अनेक द्रव्या- श्रित होने से, और रूपवान् होने से उसी की उपलब्धि होती है, यों तैजस द्रव्य का तो प्रत्यक्ष हो जायेगा, परन्तु रूपवान् न होने से पार्थिव और आप्य द्रव्य का प्रत्यक्ष न हो CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri