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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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२१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ० पार्थिवं द्रव्यमु, त्रिगुणमाप्यं प्रत्यक्षम्, तेन तत्कारणमनुमीयते तथाभूतमिति । तस्य कार्यं लिङ्गं कारणाभावाद्धि कार्याभाव इति । एवं तैजसवायव्ययोर्द्रव्ययोः प्रत्यक्षत्वाद् गुणव्यवस्थायाः तत्कारणे द्रव्ये व्यवस्थानुमानमिति । दृष्टश्च विवेकः—पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् । पार्थिवं द्रव्यमबादिभिर्वियुक्तं प्रत्यक्षतो गृह्यते, आप्यं च पराभ्याम्, तैजसं च वायुना, न चैकैकगुणं गृह्यत इति । निरनुमानं तु 'विष्टं ह्यपरं परेण' ( ३.१.६६ ) इत्येतदिति, नात्र लिङ्गम- नुमापकं गृह्यत इति येनैतदेवं प्रतिपद्येमहि । यच्चोक्तम्—'विष्टं ह्यपरं परेणेति भूतसृष्टौ वेदितव्यं न साम्प्रतम्' इति ? नियमकारणाभावादयुक्तम्¹ । दृष्टं च साम्प्रतमपरं परेण विष्टमिति वायुना च विष्टं तेज इति । विष्टत्वं संयोगः, स च द्वयोः समानः वायुना च विष्टत्वात् स्पर्शवत्तेजः, न तु तेजसा विष्टत्वाद् रूपवान् वायुरिति नियमकारणं नास्तीति । द्रव्य चतुर्गुण प्रसिद्ध है, जब कि आप्य द्रव्य त्रिगुण ही, इस व्यवस्थित गुणकार्य से व्यवस्थितगुण वाले कारण का अनुमान करते है । इस अनुमान का हेतु वह कार्य ही है, क्योंकि कारण न होने से ही कार्य नहीं होता है । इसी प्रकार, तैजस तथा वायव्य द्रव्यों के प्रत्यक्ष होने के कारण गुणव्यवस्था से कार्यव्यवस्था का अनुमान होता है। पार्थिव और आप्य पृथक्-पृथक् देखा गया है । पार्थिव द्रव्य का प्रत्यक्ष जलादि से रहित होने पर भी होता है, इसी तरह जलीय द्रव्य तेज तथा वायु से रहित भी प्रत्यक्ष से गृहीत होता है, और तैजस द्रव्य वायु से रहित स्वतन्त्रतया प्रत्यक्ष से गृहीत होता है । उस समय ये एक एक गुण वाले गृहीत नहीं होते हैं। आप का यह कहना तो निरनुमान ही है कि 'पृथिव्यादि अवादि से व्याप्त हैं' ( ३.१.६६ ) । क्योंकि यहाँ हमें ऐसा कोई अनुमापक हेतु नहीं मिलता, जिससे आप की बात से हम सहमत हो सकें । तथा आप का यह कहना भी अयुक्त ही है कि 'पृथिव्यादि अवादि से व्याप्त हैं, यह बात भूतसृष्टिप्रतिपादक पुराणों में प्रतिपादित है, भले ही आज कल हम लोगों के ध्यान में न आवें'; क्योंकि यहाँ भी आपने कोई नियमहेतु नहीं दिखाया । आज भी हम अपर (तेज) को दूसरे ( वायु ) से विष्ट ( संयुक्त ) देखते हैं, जैसे—तेज वायु से संयुक्त है । विष्टत्व का अर्थ है 'संयोग' । वह तो दोनों का समान ही है । तथा वायु से संयुक्त होने से तेज स्पर्शवान् है, परन्तु तेज से संयुक्त होने पर भी वायु रूपवान् नहीं बनती—इसमें नियमहेतु नहीं है। यह भी हम देखते हैं कि तैजस उष्ण स्पर्श से १. नियमः 'गन्ध एव पृथिव्याम्' इत्येवमादिः, तस्य कारणं प्रमाणं नास्ति; तद्बाधकस्यैव प्रमाणस्योक्तत्वात् । तस्माद् भूतसृष्टिः कथञ्चिदुपचारतो व्याख्येयेति तात्पर्यटीकायां मिश्राः । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri