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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. आ० १ आ० आत्मादेः खलु प्रमेयस्य तत्त्वज्ञानान्निश्रेयसाधिगमः । तच्चैतदुत्तरसूत्रेणा- नूद्यत इति । हेयं तस्य निर्वर्तकम्, हानमात्यन्तिकम्, तस्योपायः, अधि- गन्तव्यः—इत्येतानि चत्वार्यर्थपदानि सम्यग्बुद्ध्वा निःश्रेयसमधिगच्छति । तत्र संशयादीनां पृथग्वचनमनर्थकम्, संशयादयो यथासम्भवं प्रमाणेषु प्रमेयेषु चान्तर्भवन्तो न व्यतिरिच्यन्त इति ? सत्यमेतत्; इमास्तु चतस्रो विद्याः पृथक्प्रस्थानाः प्राणभृतामनुग्रहायोपदिश्यन्ते । यासां चतुर्थीयमान्वीक्षिकी न्यायविद्या । तस्याः पृथक्प्रस्थानाः संशयादयः पदार्थाः । तेषां पृथग्वचनमन्त- रेणाध्यात्मविद्यामात्रमियं स्यात्, यथा—उपनिषदः । तस्मात् संशयादिभिः पदार्थैः पृथक् प्रस्थाप्यते । तत्र नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थे न्यायः प्रवर्तते, किं तर्हि ? संशयितेऽर्थे । यथोक्तम्—'विमृश्य पक्षप्रतिपक्षाभ्यामर्थावधारणं निर्णयः' (१. १. ४१) इति । विमर्शः = संशयः, पक्षप्रतिपक्षौ = न्यायप्रवृत्तिः । अर्थाव- धारणम् = निर्णयः, तत्त्वज्ञानमिति । स चायं किंस्विदिति वस्तुविमर्शमात्रमनव- धारणं ज्ञानं संशयः प्रमेयेऽन्तर्भवन्नेवमर्थं पृथगुच्यते । आत्मा-आदि प्रमेयों के तत्त्व-ज्ञान से मोक्षप्राप्ति होती है। यह बात अनुपद (१.१.२ सूत्र) में स्पष्ट कर दी जायेगी १. हेय (दुःख और उसके उत्पादक अविद्या, तृष्णा आदि ), २. आत्यन्तिक हान (जिससे दुःख सदा के लिये क्षीण हो जाये अर्थात् तत्त्वज्ञान ), ३. उसके जानने का उपाय (शास्त्र), तथा ४. अधिगन्तव्य (मोक्ष)—इन चार अर्थपदों (पुरुषार्थ-स्थानों) को ठीक से जानकर अधिकारी पुरुष मोक्ष पा जाता है। शङ्का—सूत्र में संशयादि का अलग से पढ़ना निरर्थक है; क्योंकि संशयादि के प्रमाण या प्रमेयों में अन्तर्भूत होते हुये अलग से उनकी गणना नहीं होती ? बात तो ठीक है; परन्तु ये चारों विद्यायें (त्रयी, वार्ता, दण्डनीति, आन्वीक्षिकी) पृथक् विषयबोधक व्यापार वाली है, जिनमें यह चौथी आन्वीक्षिकी (न्यायविद्या) है। जिसके कि संशयादि पदार्थ पृथग्विषय माने गये हैं। इन संशयादिकों का यदि अलग से पाठ न करेंगे तो यह आन्वीक्षिकी भी अध्यात्मविद्यामात्र रह जायेगी; जैसे कि उपनिषद् । इस लिये यहाँ सूत्रकार द्वारा संशयादि पदार्थों से एक अलग ही बोध कराया गया है; क्योंकि इस तर्कशास्त्र का विषय न तो अनुपलब्ध अर्थ ही है, न निर्णीत अर्थ ही, अपितु संशयित अर्थ है। जैसा कि सूत्रकार ने कहा है—'विमर्श कर के पक्ष प्रतिपक्ष द्वारा अर्थ का अवधारण 'निर्णय' कहलाता है' (१.१.४१) । विमर्श = संशय । पक्ष प्रति- पक्ष = न्यायशास्त्र की प्रवृत्ति । अर्थावधारण = निर्णय, तत्त्वज्ञान । 'यह क्या होगा?'— ऐसा वस्तु में सन्देहमात्र अनिर्णीत ज्ञान ही 'संशय' कहलाता है। इस संशय का वस्तुतः प्रमेय में अन्तर्भाव हो सकता है, परन्तु न्यायशास्त्र की सुलभ प्रवृत्ति के लिये सूत्रकार ने पृथक् पाठ किया है। CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri