न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context२२४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० प्रत्ययोऽध्यवसाय इति । चेतनो हि पूर्वज्ञातमर्थं प्रत्यभिजानाति, तस्यैतस्माद् हेतोर्नित्यत्वं युक्तमिति । करणचैतन्याभ्युपगमे तु चेतनस्वरूपं वचनीयं नानि- र्दिष्टस्वरूपमात्मान्तरं शक्यमस्तीति प्रतिपत्तुम् । ज्ञानं चेद् बुद्धेरन्तःकरणस्या- भ्युपगम्यते, चेतनस्येदानीं किं स्वरूपम्, को धर्मः, किं तत्त्वम् ? ज्ञानेन च बुद्धौ वर्तमानेनायं चेतनः किं करोतीति ? चेतयते इति चेत् ? न ज्ञानादर्थान्तरवचनम् । पुरुषश्चेतयते बुद्धिर्जानातीति नेदं ज्ञानादर्थान्तरमुच्यते । चेतयते, जानीते, बुध्यते, पश्यति, उपलभते-इत्येको- ऽयमर्थ इति । बुद्धिर्ज्ञापयतीति चेत् ? अद्धा जानीते पुरुषो बुद्धिर्ज्ञापयतीति सत्यमेतत् । एवं चाभ्युपगमे ज्ञानं पुरुषस्येति सिद्धं भवति, न बुद्धेरन्त- करणस्येति । प्रतिपुरुषं च शब्दान्तरव्यवस्थाप्रतिज्ञाने प्रतिषेधहेतुवचनम् । यश्च प्रति- जानीते—'कश्चित् पुरुषश्चेतयते, कश्चिद् बुध्यते, कश्चिदुपलभते, कश्चित् पश्यति' इति ? पुरुषान्तराणि खल्विमानि—चेतनो बोद्धोपलब्धा द्रष्टेति, नैकस्यैते धर्मा इति, अत्र कः प्रतिषेधहेतुरिति ? बोध, अध्यवसाय, प्रत्यय—पुरुष-धर्म हैं ! चेतन ही पूर्व ज्ञात अर्थ का प्रत्यभिज्ञान करता है, अतः उस चेतन का नित्यत्व तो युक्त है; पर अन्तःकरण-धर्म को चैतन्य मानोगे तो उसका चेतनस्वरूप बतलाना पड़ेगा । अस्मदभिमत आत्मा से भिन्न अदर्शित- लक्षणक अन्य चेतन का प्रतिपादन करना असम्भव है । बुद्धि या मन को ही यदि ज्ञान हो जाता है तो अब चेतन का क्या स्वरूप, धर्म या तत्त्व रह जायेगा ? तथा ज्ञान का बुद्धि में ही सम्भव होने पर यह चेतन क्या करेगा ? यदि 'चेतना को करता है'—यह कहो तो ज्ञान तथा चेतना तो पर्यायमात्र है । 'पुरुष चेतना देता है, बुद्धि ज्ञान करती है' यह ज्ञान से अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा रहा । 'चेतना देता है, जानता है, बोध करता है, देखता है, अवगत करता है'—ये सब पर्याय एक ही बात को बतलाते हैं । यदि यह कहो कि 'बुद्धि चेतन को जानती है' तो ठीक है, पुरुष जानता है, बुद्धि प्रेरणा देती है तो आखिर यह ज्ञान किसमें सिद्ध हुआ ? पुरुष में, न कि आप के कथनानुसार मन या बुद्धि में ! प्रत्येक पुरुष में भिन्न-भिन्न शब्दों की व्यवस्था प्रतिज्ञात करोगे तो एक का दूसरे में प्रतिषेध-हेतु बतलाना पड़ेगा । जो यह प्रतिज्ञा करता है कि कोई पुरुष चेतना करता है, कोई बोध करता है, कोई प्राप्त करता है, कोई देखता है तो उसके मत में ये सब भिन्न भिन्न पुरुष हैं—चेतन, बोद्धा, उपलब्धा, द्रष्टा आदि; एक ही पुरुष के ये सब धर्म नहीं हैं, यहाँ प्रतिषेधहेतु दिखाने की आवश्यकता है ?