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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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२२८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० येण सन्निधिः, क्वचिदसन्निधिः—इत्ययं तु व्यासङ्गोऽनुज्ञायते मनस इति ॥ ८ ॥ एकमन्तःकरणं नाना वृत्तय इति सत्यभेदे वृत्तेरिदमुच्यते— स्फटिकान्यत्वाभिमानवत् तदन्यत्वाभिमानः ॥ ९ ॥ तस्यां वृत्तौ नानात्वाभिमानो यथा द्रव्यान्तरोपहिते स्फटिकद्रव्ये अन्यत्वा- भिमानः—नीलो लोहित इति, एवं विषयान्तरोपधानादिति ? न; हेत्वभावात् । स्फटिकान्यत्वाभिमानवदयं ज्ञानेषु नानात्वाभिमानो गौणो न पुनर्गन्धाद्यन्यत्वाभिमानवदिति-हेतुर्नास्ति, हेत्वभावादनुपपन्न इति । समानो हेत्वभाव इति चेत् ? न; ज्ञानानां क्रमेणोपजनापायदर्शनात् । क्रमेण हीन्द्रियार्थेषु ज्ञानान्युपजायन्ते चापयन्ति चेति दृश्यते । तस्माद् गन्धाद्यन्यत्वाभिमानवदयं ज्ञानेषु नानात्वाभिमान इति ॥ ९ ॥ क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् [ १०-१७ ] 'स्फटिकान्यत्वाभिमानवद्' इत्येतदमृष्यमाणः क्षणिकवाद्याह— है, अन्तःकरण को नहीं; परन्तु कहीं इन्द्रिय के साथ सन्निधि तथा कहीं असन्निधि— इस तरह का विषयान्तर-व्यासङ्ग तो मन में भी अनुज्ञात है ही ॥ ८ ॥ शंका—वस्तुतः अभेद होने पर भी 'अन्तःकरण एक है, वृत्तियाँ नाना हैं'—यह इसलिए कह दिया जाता है कि— स्फटिकान्यत्व के आरोप की तरह उस वृत्ति में अन्यत्व का आरोप है ? ॥ ९ ॥ उस वृत्ति में नानात्व का आरोप कर लिया जाता है। जैसे नील-रक्तादि पुष्पों के पास रखे हुए एक ही स्फटिक द्रव्य में नानात्व का आरोप ( भ्रम ) होता है कि यह नील स्फटिक है, यह रक्त स्फटिक है; उसी तरह विषयान्तर के उपधान ( अनुग्रह ) से वृत्ति में नानात्व का आरोप है ? उत्तर—उक्त दृष्टान्त में कोई हेतु न होने से ऐसा मानना उचित नहीं। 'स्फटि- कान्यत्वाभिमान की तरह यह ज्ञानों में नानात्वाभिमान गौण ( आहार्यारोप ) है, गन्धाद्यन्यत्वाभिमान की तरह वास्तविक नहीं'—इस अनुमान में हेतु नहीं है। अतः हेतु न दिखाया जाने से यह अनुमान बनेगा ही नहीं। हेत्वभाव तो आपके पक्ष में भी है ? नहीं; क्योंकि अस्मदभिमत में ज्ञानों का क्रमशः उत्पत्तिविनाश लोक में प्रत्यक्ष है। इन्द्रियार्थ के सन्निकर्ष में क्रमशः ज्ञान उत्पन्न तथा विनष्ट होते रहते हैं—यह लोक में वारंवार देखते हैं। अतः यह स्पष्ट है कि वृत्ति में नानात्वारोप गन्धाद्यन्यत्वाभिमान की तरह मुख्य ही है, आहार्यारोप नहीं ॥ ९ ॥ [ अब सूत्रकार बौद्धमत से सांख्यमत में दूषण दिखाते हुए बौद्धों के प्रसिद्ध क्षणिक- वाद के खण्डन का उपक्रम कर रहे हैं— ] सूत्रोक्त 'स्फटिकान्यत्वाभिमानवत्' इस हेतु को असह्य करते हुए क्षणिकविज्ञानवादी ( बौद्ध ) कहते हैं—