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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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२३० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० भ्यनुज्ञा। यत्र यत्रोपचयापचयप्रबन्धो दृश्यते, तत्र तत्र व्यक्तीनामपरापरो- त्पत्तिरुपचयापचयप्रबन्धदर्शनेनाभ्यनुज्ञायते, यथा—शरीरादिषु। यत्र यत्र न दृश्यते तत्र तत्र प्रत्याख्यायते, यथा—ग्रावप्रभृतिषु। स्फटिकेऽप्युपचयापचय- प्रबन्धो न दृश्यते। तस्मादयुक्तम्—स्फटिकेऽप्यपरापरोत्पत्तिरिति। यथा चार्कस्य कटुकिम्ना सर्वद्रव्याणां कटुकिमानमापादयेत्, तादृगेतदिति ॥ ११ ॥ यश्च—अशेषनिरोधेनापूर्वोत्पादं निरन्वयं द्रव्यसन्ताने क्षणिकतां मन्यते, तस्यैतत् न; उत्पत्तिविनाशकारणोपलब्धेः ॥ १२ ॥ उत्पत्तिकारणं तावदुपलभ्यते—अवयवोपचयो वल्मीकादीनाम्। विनाश- कारणं चोपलभ्यते—घटादीनामवयवविभागः। यस्य त्वनपचितावयवं निरुध्यते अनुपचितावयवं चोत्पद्यते, तस्याशेषनिरोधे निरन्वये वाऽपूर्वोत्पादे न कारण- मुभयत्राप्युपलभ्यते इति ॥ १२ ॥ क्षीरविनाशे कारणानुपलब्धिवद् दध्युत्पत्तिवच्च तदुत्पत्तिः ? ॥ १३ ॥ कोई प्रत्यक्ष है, न अनुमान; अतः जहाँ जैसे देखें वैसा स्वीकार लेना चाहिये। जहाँ- जहाँ उपचयापचयप्रबन्ध देखें वहाँ-वहाँ व्यक्तियों के उपचयापचय से उनके उत्पाद- विनाश की कल्पना से यथाकथमपि अपर अपर व्यक्ति के उत्पत्ति-विनाश माने जा सकते हैं, जैसे—शरीरादि में; परन्तु जहाँ-जहाँ उपचयापचय न दिखायी दे वहाँ उक्त कल्पना का प्रत्याख्यान भी किया जा सकता है, जैसे—शिला आदि में। स्फटिक में भी अपर-अपर व्यक्ति के उत्पाद-विनाश की कल्पना अयुक्त ही है; अन्यथा यह बात तो वैसी ही होगी जैसे कोई पुरुष अर्क के कटुत्व का अनुभव करके सभी द्रव्यों को कटु समझने लगे ॥ ११ ॥ और जो वादी (बौद्ध) सर्वावयवनाश हेतु से पूर्वांश से असम्बद्ध वैसे अपूर्व उत्पाद को द्रव्यसन्तान-धारा में क्षणिकता को स्वीकार करता है, उसकी यह बात उचित नहीं; उत्पत्ति तथा विनाश का कारण उपलब्ध होने से ॥ १२ ॥ (लोक में) वृद्धिरूप उत्पत्ति में कारण मिलता है, जैसे—वल्मीकादि का अवयवो- पचय। अपचयरूप विनाश में भी कारण उपलब्ध होता है, जैसे—घटादि का अवयवशः विभाग। जिसके मत में अनपचितावयव द्रव्य विनष्ट तथा उपचितावयव द्रव्य उत्पन्न हो जाता है, उसके इस (सर्वावयवनाश तथा अपूर्व उत्पाद) मत के दोनों ही पक्षों का साधक कोई हेतु लोक में नहीं मिलता ॥ १२ ॥ शंका— दूध के विनाश में कारणानुपलब्धि की तरह तथा दधि की उत्पत्ति की तरह (उपर्युक्त तथाविध) उत्पत्ति सिद्ध हो जायेगी ? ॥ १३ ॥

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