न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context२३४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [३. अ० २. आ० खल्वयमर्थः, परीक्षाशेषं प्रवर्त्तयामोति प्रक्रियते। सोऽयं बुद्धौ सन्निकर्षोत्पत्तेः संशयः; विशेषास्याग्रहणादिति। तत्रायं विशेष :— नेन्द्रियार्थयोः, तद्विनाशेऽपि ज्ञानावस्थानात् ॥ १८ ॥ नेन्द्रियाणामर्थानां वा गुणो ज्ञानम्; तेषां विनाशे ज्ञानस्य भावात्। भवति खल्विदमिन्द्रियेऽर्थे च विनष्टे—ज्ञानमद्राक्षमिति। न च ज्ञातरि विनष्टे ज्ञानं भवितुमर्हति। अन्यत् खलु वै तदिन्द्रियार्थसन्निकर्षजं ज्ञानं यदिन्द्रियार्थविनाशे न भवति। इदमन्यदात्ममनःसन्निकर्षजं तस्य युक्तो भाव इति। स्मृतिः खल्विव- यम्—'अद्राक्षम्' इति पूर्वदृष्टविषया। न च विज्ञातार नष्टे पूर्वोपलब्धेः स्मरणं युक्तम्, न चान्यदृष्टमन्यः स्मरति। न च मनसि ज्ञातर्यभ्युपगम्यमाने शक्य- मिन्द्रियार्थयोर्ज्ञातृत्वं प्रतिपादयितुम् ॥ १८ ॥ अस्तु तर्हि मनोगुणो ज्ञानम् ? युगपज्ज्ञेयानुपलब्धेश्च न मनसः ॥ १९ ॥ 'युगपज्ज्ञेयानुपलब्धिरन्तःकरणस्य लिङ्गम्' ( १.१.१६ ), तत्र युगपज्ज्ञेया- चुका है; परन्तु इसके विशेष परिज्ञान के लिए पुनः विचार प्रारम्भ कर रहे हैं। बुद्धि में आत्मा, इन्द्रिय, तथा अर्थ के सन्निकर्ष की अपेक्षा होती है, अतः इन का यह गुण है— यह तो निश्चित हो गया; परन्तु इनमें से यह किस एक का गुण है—ऐसा विशेष ज्ञान नहीं होता—अतः संशय उपस्थित हो गया । यहाँ विशेष वक्तव्य यह है— इन्द्रिय तथा अर्थ का गुण बुद्धि नहीं है; क्योंकि उनके विनष्ट होने पर भी वह रहती है ॥ १८ ॥ बुद्धि इन्द्रियों या अर्थों का गुण नहीं है, क्योंकि उन इन्द्रियों तथा अर्थों के विनष्ट होने पर भी ज्ञान यथास्थित रहता है। इन्द्रिय तथा अर्थ के विनष्ट होने पर भी ऐसा होता है कि 'इसको मैंने देखा था', अन्यथा ज्ञाता के विनष्ट होने पर ज्ञान नहीं रहता ! वह इन्द्रियार्थसन्निकर्षज ज्ञान ( चाक्षुष-आदि ) दूसरा है, जो इन्द्रियार्थविनाश होने पर नहीं होता। परन्तु 'मैंने देखा था' यह आत्ममनःसन्निकर्षज ज्ञान दूसरा है, यह तो रह ही सकता है । 'मैंने इसे देखा था' यह पूर्वदृष्टविषयक स्मृति है। विज्ञाता के नष्ट होने पर पहले देखी हुई वस्तु का स्मरण युक्त नहीं; क्योंकि अन्य दृष्ट को अन्य कैसे स्मरण करेगा ? मन को ज्ञाता स्वीकार कर लिये जाने पर इन्द्रियार्थ को ज्ञाता बताना भी उचित नहीं ॥ १८ ॥ तो फिर मन को ही बुद्धि का गुण मान लें ? युगपज्ज्ञेयानुपलब्धि होने से बुद्धि मन का गुण नहीं है ॥ १९ ॥ युगपज्ज्ञेयानुपलब्धि अन्तःकरण ( मन ) का अनुमापक है। युगपज्ज्ञेयानुपलब्धिहेतु