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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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२४० ' वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ० वाऽऽकस्मिकतया, ज्ञातया व मनसः ? सर्वथा चानुपपत्तिः। कथम् ? स्मर्त्तव्यत्वादि- च्छात्तः स्मरणज्ञानासम्भवाच्च । यदि तावदात्मा-अमुष्यार्थस्य स्मृतिहेतुः संस्कारः अमुस्मिन्नात्मदेशे समवेतस्तेन मनः संयुज्यतामिति मनः प्रेरयति, तदा स्मृत एवा- सावर्थो भवति, न स्मर्त्तव्यः । न चात्मप्रत्यक्ष आत्मप्रदेशः संस्कारो वा, तत्रानुप- पन्नाऽऽत्मप्रत्यक्षेण संवित्तिरिति । सुस्मूर्षया चायं मनः प्रणिदधानश्चिरादपि कञ्चिदर्थं स्मरति, नाकस्मात् । ज्ञातृत्वं च मनसो नास्ति, ज्ञानप्रतिषेधादिति ॥३१॥ एतच्च— व्यासक्तमनसः पादव्यथनेन संयोगविशेषेण समानम् ॥ ३२ ॥ यदा खल्वयं व्यासक्तमनाः क्वचिद् देशे शर्करया कण्टकेन वा पादव्यथन- माप्नोति, तदाऽऽत्ममनःसंयोगविशेष एषितव्यः । दृष्टं हि दुःखं दुःखवेदनं चेति तत्रायं समानः प्रतिषेधः । यदृच्छया तु न विशेषः, नाकस्मिकी क्रिया, नाक- स्मिकः संयोग इति । कर्मादृष्टमुपभोगार्थं क्रियाहेतुरिति चेत् ? समानम् । कर्मादृष्टं पुरुषस्थं पुरुषोपभोगार्थं मनसि क्रियाहेतुः, एवं दुःखं दुःखसंवेदनं च यदृच्छा से ( अकस्मात् ) हो, या मन की ज्ञातृता से हो—तीनों ही विकल्पों में उपपा- दन नहीं बनेगा । कैसे ? स्मर्त्तव्य होने से, या इच्छा द्वारा स्मरणज्ञान सम्भव न होने से । यदि आत्मा 'अमुक अर्थ का स्मृतिहेतु संस्कार अमुक आत्मप्रदेश में समवेत हुआ है, अतः उससे साथ जाकर मन संयुक्त हो'—ऐसी प्रेरणा मन को करता है तो वह अर्थ आत्मा द्वारा स्मृत ही है, स्मर्त्तव्य उसमें क्या रह गया ! और उक्त प्रेरणा भी अनुपपन्न है, क्योंकि आत्मप्रदेश तथा संस्कार आत्मप्रत्यक्ष हैं नहीं, अतः वहाँ आत्मप्रत्यक्ष से संवित्ति अनुपपन्न है । स्मरण करने की इच्छा से मन प्रणिधान करता हुआ बहुत देर में भी किसी अर्थ को स्मरण करता है, अकस्मात् नहीं । अतः दूसरा पक्ष भी अनुपपन्न है; क्योंकि मन में ज्ञानप्रतिषेध पहले प्रतिपादित किया जा चुका, अतः उसमें ज्ञातृत्व अनुपपन्न है ॥३१॥ दूसरे एकदेशिमत का खण्डन— और यह कथन— व्यासक्तमना पुरुष के पादव्यथन द्वारा हुए संयोगविशेष के समान है ॥ ३२ ॥ जब यह अन्यासक्तचित्त पुरुष किसी जगह कंकड़ या काँटे से पैर में बिंध जाता हैं, तब एक विशिष्ट आत्ममनःसंयोग मानना ही पड़ेगा; क्योंकि लोक में वैसा दुःख तथा दुःखानुभूति भी देखी जाती है । इसमें भी प्रतिषेध पहले जैसा ही है; क्योंकि यदृच्छा से यह संयोगविशेष नहीं होता, न यहाँ आकस्मिकी क्रिया ही होती है, न तथाभूत संयोग ही । यदि वैसे संयोगविशेष में अदृष्ट कर्म ही उपभोग के लिये क्रिया का हेतु हो जायेगा ? तो यह बात स्मृतिहेतु मनःसंयोग में भी समान है । पुरुषस्थ अदृष्ट कर्म पुरुष के उप-