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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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२५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आं० ऽवधारणे। कथम् ? ज्ञस्वभावत्वात्। ज्ञ इत्यस्य स्वभावः स्वो धर्मः, अयं खलु 'ज्ञास्यति, जानाति, अज्ञासीत्' इति त्रिकालविषयेणानेकेन ज्ञानेन सम्बध्यते, तच्चास्य त्रिकालविषयं ज्ञानं प्रत्यात्मवेदनीयम्-'ज्ञास्यामि, जानामि, अज्ञासिषम्' इति वर्तते, तद्यस्यायं स्वो धर्मस्तस्य स्मरणम्, न बुद्धिप्रबन्धमात्रस्य निरा- त्मकस्येति ॥ ४० ॥ स्मृतिहेतूनामयौगपद्याद्युगपदस्मरणमित्युक्तम्। अथ केभ्यः स्मृतिरुत्पद्यत इति ? स्मृतिः खलु— प्रणिधाननिबन्धाभ्यासलिङ्गलक्षणसादृश्यपरिग्रहाश्रयाश्रितसम्बन्धानन्तर्य- वियोगैककार्यविरोधातिशयप्राप्तिव्यवधानसुखदुःखेच्छाद्वेषभयार्थित्वक्रियाराग - धर्माधर्मनिमित्तेभ्यः ॥ ४१ ॥ सुस्मूर्षया मनसो धारणं प्रणिधानं सुस्मूर्षितलिङ्गचिन्तनं चार्थस्मृति- कारणम्। निबन्धः खल्वेकग्रन्थोपनयमोऽर्थानाम्, एकग्रन्थोपनताः खल्वर्था अन्योऽ- न्यस्मृतिहेतव आनुपूर्व्येणेतरथा वा भवन्तीति। धारणाशास्त्रकृतो१ वा प्रज्ञा- सूत्र में 'तु' शब्द निश्चयार्थक है। क्यों ? ज्ञस्वभाव ज्ञाता का अपना धर्म है, वह 'जानेगा', 'जानता है', 'जानता था'—इस त्रिकालविषयक अनेक ज्ञान से सम्बद्ध होता है। यह त्रिकालविषयक ज्ञान 'जानूँगा' 'जानता हूँ' 'जानता था'—ऐसा प्रत्यात्म- वेदनीय (प्रतिव्यक्ति को अनुभवसिद्ध) होता है। जिसका यह स्वधर्म है वही स्मरण करता है, न कि निरात्मक बुद्धिसन्तानमात्र ॥ ४० ॥ स्मृतिहेतुओं में यौगपद्य न रहने से युगपद् स्मरण नहीं होता—यह पहले कह आये हैं। यह स्मृति— प्रणिधान, निबन्ध, अभ्यास, लिङ्ग, लक्षण, सादृश्य, परिग्रह, आश्रय, आश्रित, सम्बन्ध, आनन्तर्य, वियोग, एककार्य, विरोध, अतिशय, प्राप्ति, व्यवधान, सुख-दुःख, इच्छा-द्वेष, भय, अर्थित्व, क्रिया, राग, धर्म, अधर्म—इन २५ निमित्तों से होती है ॥४१॥ स्मरण करने की इच्छा से मन को एक में धारण करना, अर्थात् उस सुस्मूर्षा-विषय के अतिरिक्त अन्यत्र गये मन को निवारण करना 'प्रणिधान' कहलाता है। सुस्मूर्षित के चिह्न का चिन्तन भी अर्थ का स्मरण करता है। एक ग्रन्थ में आये हुए अर्थ (विषय), जैसे इसी ग्रन्थ में प्रमाणादि पदार्थ, 'निबन्ध' कहलाते हैं। एक ग्रन्थ में आये हुए पदार्थ अनुक्रम या व्युत्क्रम से अन्योन्यस्मृतिहेतु होते हैं। जैगीषव्यादि महर्षि प्रोक्त 'धारणाशास्त्र', तत्कृत प्रज्ञातवस्तुओं में स्मर्तव्य विषयों का समारोप भी 'निबन्ध' है, १. "धारणाशास्त्रं जैगीषव्यादिप्रोक्तम्, तत्कृतो ज्ञातेष्वेव वस्तुषु नाडीचक्रहृत्पु- ण्डरीककण्ठकूपनासाग्रतालुललाटब्रह्मरन्ध्रादिषु स्मर्त्तव्यानां बीजरूपसंस्थानास्त्राभरणभू- तानां देवतानामुपनिक्षेपः समारोपः। तथा च तत्र देवताः समारोपितास्तत्तदवयवग्रहणात् स्मर्यन्ते इत्यर्थः"—इति तात्पर्यटीकायां वाचस्पतिमिश्राः।