BharatKosha
न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

Page 27 of 410

Read in context
Page 27

१. सू० ] अनुबन्धचतुष्टयप्रकरणम् ९ साधनीयार्थस्य यावति शब्दसमूहे सिद्धिः परिसमाप्यते, तस्य पञ्चावयवाः प्रतिज्ञादयः समूहमपेक्ष्यावयवा उच्यन्ते । तेषु प्रमाणसमवायः आगमः प्रतिज्ञा, हेतुरनुमानम्, उदाहरणं प्रत्यक्षम्, उपनयनमुपमानम्, सर्वेषामेकार्थसमवाये सामर्थ्यप्रदर्शनं निगमनमिति । सोऽयं परमो न्याय इति । एतेन वादजल्पवितण्डाः प्रवर्तन्ते, नातोऽन्यथेति । तदाश्रया च तत्त्वव्यवस्था । ते चैतेऽवयवाः शब्द- विशेषाः सन्तः प्रमेयेऽन्तर्भूताः, एवमर्थं पृथगुच्यन्त इति । तर्को न प्रमाणसंगृहीतः, न प्रमाणान्तरम्, प्रमाणानामनुग्राहकस्तत्त्वज्ञानाय कल्पते । तस्योदाहरणम्—किमिदं जन्म कृतकेन हेतुना निर्वर्त्यते ? आहोस्विद- कृतकेन ? अथाकस्मिकमिति ? एवमविज्ञातेऽर्थे कारणोपपत्त्या ऊहः प्रवर्तते— 'यदि कृतकेन हेतुना निर्वर्त्यते ? हेतूच्छेदादुपपन्नोऽयं जन्मोच्छेदः । अथाकृत- केन हेतुना ? ततो हेतूच्छेदाशक्यत्वादद्यनुपपन्नो जन्मोच्छेदः । अथाकस्मि- कम् ? अतोऽकस्मान्निर्वर्त्यमानं न पुनर्निर्वर्त्स्यतीति निवृत्तिकारणं नोपपद्यते, तेन जन्मानुच्छेदः' इति । एतस्मिंस्तर्कविषये कर्मनिमित्तं जन्मेति प्रमाणानि प्रवर्तमानानि तर्केणाऽनुगृह्यन्ते । तत्त्वज्ञानविषयस्य विभागात् तत्त्वज्ञानाय कल्पते पाँचों अवयवों द्वारा ज्ञापनीय अर्थ का जितने शब्दसमूह से विशेष प्रत्यय हो जाये, उस शब्दसमूह के प्रतिज्ञादि पाँचों अवयव समूह की अपेक्षा से अवयव कहलाते हैं । इन अवयवों में ही सब प्रमाण एकत्र हो जाते हैं । जैसे—'प्रतिज्ञा' शब्दप्रमाण है, 'हेतु' अनु- मान प्रमाण है, 'उदाहरण' प्रत्यक्ष प्रमाण है, 'उपनयन' उपमान प्रमाण है, सभी प्रमाणों का एकार्थ-प्रतिपादन में सामर्थ्य-प्रदर्शन 'निगमन' कहलाता है । इन्ही पाँचों अवयवों के सहारे—वाद, जल्प, वितण्डा की प्रवृत्ति होती है । तत्त्वज्ञान-व्यवस्था भी तदधीन है । इन पाँचों अवयवों के वस्तुतः शब्दविशेष ही होने के कारण प्रमेय के अन्तर्भूत होते हुए भी, इसीलिए इनका अलग से निर्वचन किया गया है । तर्क न प्रमाणों में अन्तर्भूत हो सकता है, न यह उन से कोई अलग प्रमाण है, अपितु उन प्रमाणों का सहकारिमात्र है, जैसे दीपक चक्षु का सहकारी होता है । उदाहरण— 'यह जन्म क्या विनाशी कारण से निष्पन्न होता है, या अविनाशी कारण से अथवा आकस्मिक कारण से ?'—इस प्रकार के संशयित अर्थ में सम्भावित कारण और कार्यों के विचार में तर्क उठता है—'यदि विनाशी कारण से जन्म निष्पन्न होता तो कारण के विनाश से जन्म का उच्छेद भी हो ही जायेगा, यदि अविनाशी कारण से निष्पन्न होगा तो कारण का नाश कभी न हो पाने के कारण जन्मोच्छेद ही असम्भव हो जायेगा, यदि आकस्मिक कारण माना जाये तो अकस्मात् जन्मोच्छेद हो पुनः जन्म निष्पन्न न होगा— इस तरह निवृत्तिकारण न बनने से जन्म का उच्छेद होगा ही नहीं । इस प्रकार की तर्कणा के अवसर पर 'जन्म कर्मनिमित्तक है'—ऐसा प्रमाणों से सिद्ध होता है । इस CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri