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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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४३. सू० ] बुद्धेरूत्पन्नापवर्गित्वपरीक्षाप्रकरणम् २५३ कालान्तरावस्थाने तु बुद्धेर्दृश्यव्यवधानेऽपि प्रत्यक्षमवतिष्ठेतेति । स्मृतिश्चा- लिङ्गं बुद्धयवस्थाने; संस्कारस्य बुद्धिजन्यस्य स्मृतिहेतुत्वात् । यश्च मन्येत—अवतिष्ठते बुद्धिः, दृष्टा हि बुद्धिविषये स्मृतिः, सा च बुद्धाव- नित्यायां कारणाभावान्न स्यादिति ? तदियमलिङ्गम् । कस्मात् ? बुद्धिजो हि संस्कारो गुणान्तरं स्मृतिहेतुः, न बुद्धिरिति । हेत्वभावादयुक्तमिति चेत् ? बुद्धयवस्थानात् प्रत्यक्षत्वे स्मृत्यभावः । यावदवतिष्ठते बुद्धिस्तावदसौ बोद्धव्यार्थः प्रत्यक्षः, प्रत्यक्षे च स्मृतिरनु- पपन्नेति ॥ ४२ ॥ अव्यक्तग्रहणमनवस्थाstatitv... अव्यक्तग्रहणमनवस्थायित्वाद्विद्युत्सम्पाते रूपाव्यक्तग्रहणवत् ॥ ४३ ॥ यद्युत्पन्नापवर्गिणी बुद्धिः; प्राप्तमव्यक्तं बोद्धव्यस्य ग्रहणम्, यथा विद्यु- त्सम्पाते वैद्युतस्य प्रकाशस्यानवस्थानादव्यक्तं रूपग्रहणमिति । व्यक्तं तु द्रव्याणां ग्रहणम्, तस्मादयुक्तमेतदिति ? ॥ ४३ ॥ से घट के अव्यवधान में उत्पन्न होती रहती है । व्यवधान में प्रत्यक्ष भी उत्पन्न नहीं होता । अन्यथा घट की तरह उसको कालान्तरावस्थायी मानने पर बुद्धि का दृश्यव्यव- धान होने पर भी प्रत्यक्ष होना चाहिए । आज देखे हुये घट को दूसरे दिन स्मरण कर लेते हैं—यह स्मृति भी बुद्धि की स्थायिता सिद्ध नहीं कर सकती; क्योंकि स्मृति में बुद्धिजन्य संस्कार हेतु है; न कि साक्षात् बुद्धि । जो यह मानता है कि—'बुद्धि स्थिर है, क्योंकि उसके विषय में स्मृति होती है, यदि बुद्धि अनित्य होती तो कारण न रहने से स्मृतिरूप कार्य कैसे होगा ?' यह मत अहेतुक है; क्योंकि बुद्धिजन्य संस्कार ही स्मृतिहेतु है वह गुणान्तर है; न कि साक्षात् बुद्धि । आप की भी बात हेतु के होने से अयुक्त ही है ? यह नहीं कह सकते; क्योंकि बुद्धि नित्य होने से बराबर प्रत्यक्ष रहेगी, फिर उसकी स्मृति कहाँ बनेगी ! कारण, जब तक बुद्धि रहेगी तब तक वह बोद्धव्यार्थ प्रत्यक्ष रहेगा और प्रत्यक्ष के रहते स्मृति कैसे उत्पन्न होगी ! ॥ ४२ ॥ यदि रूपज्ञान अनवस्थायी होगा तो वह, विद्युत्संपात में क्षणिक अव्यक्त रूपज्ञान की तरह, अव्यक्त ही गृहीत होगा ? ॥ ४३ ॥ यदि उत्पत्तिविनाशिनी बुद्धि है तो संयुक्त बोद्धव्य विषय का ज्ञान भी अव्यक्त ही होगा, जैसे विद्युत्संपात में वैद्युत प्रकाश के अस्थिर होने से रूप का अव्यक्त ज्ञान होता है, जब कि द्रव्यों का ज्ञान व्यक्त होता है । अतः ज्ञान का कालान्तरानवस्थायित्व पक्ष अयुक्त ही है ? ॥ ४३ ॥