न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context४९. सू० ] बुद्धेः शरीरगुणव्यतिरेकपरीक्षाप्रकरणम् २५७ संस्कारानुपपत्तिर्भवति । यथाविधे शरीरे चेतना गृह्यते, तथाविध एवात्यन्तोपरम- श्चेतनाया गृह्यते । तस्मात् संस्कारवदित्यसमः समाधिः । अथापि शरीरस्थं चेतनोत्पत्तिकारणं स्याद् ? द्रव्यान्तरस्थं वा ? उभयस्थं वा ? तन्न; नियमहेत्वभावात् । शरीरस्थेन कदाचिच्चेतनोत्पद्यते, कदाचिन्नति नियमे हेतुर्नास्तीति । द्रव्यान्तरस्थेन च शरीर एव चेतनोत्पद्यते, न लोष्टादिषु इत्यत्र न नियमहेतुरस्तीति । उभयस्य निमित्तत्वे शरीरसमानजातीयद्रव्ये चेतना नोत्पद्यते, शरीर एव चोत्पद्यते इति नियमे हेतुर्नास्तीति ॥ ४७ ॥ यच्च मन्येत—सति श्यामादिगुणे द्रव्ये श्यामाद्युपरमो दृष्ट, एवं चेतनोपरमः स्यादिति ? न; पाकजगुणान्तरोत्पत्तेः ॥ ४८ ॥ नात्यन्तं रूपोपरमो द्रव्यस्य, श्यामरूपे निवृत्ते पाकजं गुणान्तरं रक्तं रूपमुत्पद्यते, शरीरे तु चेतनामात्रोपरमोऽत्यन्तमिति ॥ ४८ ॥ अथापि— प्रतिद्वन्द्विसिद्धेः पाकजानामप्रतिषेधः ॥ ४९ ॥ परन्तु जिस स्थिति के शरीर में चेतना गृहीत होती है उसी तरह के शरीर में चेतना का नाश भी देखा जाता है । अतः 'संस्कार की तरह' यह समाधान तुल्य नहीं है । यदि यह कहें कि शरीरस्थ या द्रव्यान्तरस्थ या शरीरस्थ द्रव्यान्तरस्थ—दोनों ही उत्पत्तिकारण हैं ? नियमहेतु न होने से यह नहीं कह सकते; क्योंकि 'शरीरस्थ कारण से कभी चेतना उत्पन्न हो, कभी नहीं'—इस नियम में कोई हेतु नहीं बनता । तथा 'द्रव्यान्तरस्थ कारण से शरीर में चेतना उत्पन्न हो, सिकता-पाषाणादि में नहीं'—इस नियम में भी कोई हेतु नहीं बन सकता । अथ च—उभयस्थ मानने पर, 'शरीरसमानजातीय द्रव्य में चेतना उत्पन्न न हो, केवल शरीर में ही उत्पन्न हो'—इस नियम में भी कोई हेतु नहीं बन पाता ॥ ४७ ॥ और जो ऐसा माना जाय कि 'जैसे श्यामादिगुणवान् द्रव्य में, द्रव्य के रहते हुए भी श्यामादि गुण का नाश हो जाता है, उसी तरह शरीर के रहते चेतना का उपरम हो जाता है ?' पाकजगुणान्तरोत्पत्ति के कारण ऐसा नहीं मान सकते ॥ ४८ ॥ द्रव्य का आत्यन्तिक रूपनाश नहीं होता । श्यामरूप के निवृत्त होने पर पाकजन्य गुणान्तर रक्तरूप उत्पन्न होता है, किन्तु शरीर में चेतनामात्र का आत्यन्तिक उपरम हो जाता है । अतः यह दृष्टान्त अनुपपन्न है ॥ ४८ ॥ एक बात और— प्रतिद्वन्द्वी की सिद्धि होने से यहाँ पाकज गुणों वाला प्रतिषेध भी नहीं बनता ॥४९॥ न्या० द० ३८/३७