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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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१२. सू० ] प्रेत्यभावपरीक्षाप्रकरणम् २७९ कथमुत्पत्तिरिति चेत् ? व्यक्ताद् व्यक्तानाम्; प्रत्यक्षप्रामाण्यात् ॥ ११ ॥ केन प्रकारेण किन्धर्मकात् कारणाद्व्यक्तं शरीराद्युत्पद्यत इति ? व्यक्ताद् भूतसमाख्यातात् पृथिव्यादितः परमसूक्ष्मान्नित्याद्व्यक्तं शरीरेन्द्रियविषयोपकर- णाधारं प्रज्ञातं द्रव्यमुत्पद्यते । व्यक्तं च खल्विन्द्रियग्राह्यं तत्सामान्यात् कारण- मपि व्यक्तम् । किं सामान्यम् ? रूपादिगुणयोगः । रूपादिगुणयुक्तेभ्यः पृथिव्या- दिभ्यो नित्येभ्यो रूपादिगुणयुक्तं शरीराद्युत्पद्यते । प्रत्यक्षप्रामाण्यात् । दृष्टो हि रूपादिगुणयुक्तेभ्योमृत्प्रभृतिभ्यस्तथाभूतस्य द्रव्यस्योत्पादः, तेन चादृष्टस्या- नुमानमिति । रूपादीनान्वयदर्शनात् प्रकृतिविकारयोः, पृथिव्यादीनां नित्या- नामतीन्द्रियाणां कारणभावोऽनुमीयत इति ॥ ११ ॥ न; घटाद् घटानिष्पत्तेः ? ॥ १२ ॥ इदमपि प्रत्यक्षम्-न खलु व्यक्ताद् घटाद्व्यक्तो घट उत्पद्यमानो दृश्यते इति, व्यक्ताद् व्यक्तस्यानुत्पत्तिदर्शनान्न व्यक्तं कारणमिति ? ॥ १२ ॥ तो वह उत्पत्ति कैसे होती है ? व्यक्त से व्यक्त की ( उत्पत्ति होती है );प्रत्यक्षप्रामाण्य होने से ॥ ११ ॥ किस प्रकार से किस धर्म वाले कारण से व्यक्त शरीरादि उत्पन्न होते हैं ? 'भूत' इस संज्ञा से प्रसिद्ध व्यक्त पृथिव्यादि नित्य सूक्ष्म परमाणु द्रव्यों से शरीर, इन्द्रिय तथा अन्य अवयवों को धारण करने वाला व्यक्त ( स्थूल ) द्रव्य उत्पन्न होता है। यह व्यक्त इन्द्रियग्राह्य है। यहाँ कारण तथा कार्य में साधारणता होने से पृथिव्यादि परमाणु कारण भी व्यक्त ही कहलाता है। यह साधारणता क्या है ? रूपादिगुण-संयुक्त नित्य पृथिव्यादि परमाणुओं से रूपादिगुणयुक्त शरीरादि उत्पन्न होते हैं। हमारी इस युक्ति में प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। रूपादिगुणयुक्त मृत्तिका आदि से रूपादिगुणयुक्त घटादि द्रव्य की उत्पत्ति देखी जाती है। वहाँ जो अवयव प्रत्यक्ष नहीं हैं, उसका अनुमान कर लेते हैं। प्रकृति-विकार में रूपादि का सम्बन्ध देखा जाने से नित्य पृथिव्यादि अतीन्द्रिय परमाणुरूप कारण का अनुमान कर लिया जाता है ॥ ११ आपका मत ठीक नहीं; क्योंकि लोक में घट से घट की निष्पत्ति नहीं देखी जाती ? ॥ १२ ॥ यह बात तो प्रत्यक्षसिद्ध है कि व्यक्त घट से व्यक्त घट की उत्पत्ति नहीं हुआ करती, यों व्यक्त से व्यक्त की उत्पत्ति न देखे जाने से व्यक्त इस सृष्टि का कारण नहीं हो सकता ? ॥ १२ ॥

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