न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context१२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० १. आ० दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायाद- पवर्गः ॥ २ ॥ तत्रात्माद्यपवर्गपर्यन्तं प्रमेये मिथ्याज्ञानमनेकप्रकारकं वर्त्तते । आत्मनि तावत्-नास्तीति । अनात्मनि-आत्मेति । दुःखे-सुखमिति । अनित्ये-नित्यमिति । अत्राणे-त्राणमिति । सभये-निर्भयमिति । जुगुप्सिते-अभिमतमिति । हातव्ये- अप्रतिहातव्यमिति । प्रवृत्तौ-'नास्ति कर्म, नास्ति कर्मफलम्' इति । दोषेषु- 'नायं दोषनिमित्तः संसारः' इति । प्रेत्यभावे-'नास्ति जन्तुर्जीवो वा, सत्त्व आत्मा वा यः प्रेयात्, प्रेत्य च भवेदिति, अनिमित्तं जन्म, अनिमित्तो जन्मोपरम इत्यादि- मान् प्रेत्यभावः, अनन्तश्चेति, नैमित्तिकः सन्नकर्मनिमित्तः प्रेत्यभाव इति, देहे- न्द्रियबुद्धिवेदनासन्तानोच्छेदप्रतिसन्धानाभ्यां निरात्मकः प्रेत्यभावः' इति । अपवर्गे-'भीष्मः खल्वयं सर्वकार्योपरमः, सर्वविप्रयोगेऽपवर्गे बहु भद्रकं लुप्यत इति कथं बुद्धिमान् सर्वसुखोच्छेदमचैतन्यममुपवर्गं रोचयेत्' इति । मिथ्या ज्ञान नष्ट होता है, मिथ्याज्ञान-नाश से दोष नष्ट होते हैं, दोषापाय से प्रवृत्ति नहीं होती, प्रवृत्ति न होने से जन्म नहीं होता, जन्म न होने से दुःख नहीं होता तथा दुःख के न होने से अपवर्ग (स्वतः सिद्ध) हो जाता है ॥ २ ॥ यहाँ आत्मा से अपवर्ग पर्यन्त प्रमेयों में अनेक तरह का मिथ्याज्ञान रहता है, जैसे— आत्मा 'नहीं हैं', ऐसा मिथ्याज्ञान; अनात्म-पदार्थों में 'आत्मा हैं' ऐसा; दुःख में 'सुख' ऐसा; अनित्य ( देहादि ) में 'नित्य' ऐसा; अत्राण ( कलत्र पुत्र गेहादि ) में 'त्राण' ऐसा; सभय ( धन-पुत्र आदि ) में 'निर्भय' ऐसा; जुगुप्सित ( अस्थि, मांस, शोणित, मल, मूत्रादि से युक्त स्वशरीर-परशरीर ) में 'प्रशस्त' ऐसा; हातव्य (जन्म आदि संसार ) में 'अप्रहातव्य' ऐसा; प्रवृत्ति (पुण्य-पापादि अदृष्ट कर्म) में 'कर्म नहीं हैं', 'कर्म स्वर्ग-नर- कादि-फलप्रद नहीं हैं' ऐसा; दोष ( राग, द्वेष, मोह ) में 'यह संसार दोष के कारण नहीं हैं' ऐसा; प्रेत्यभाव (मरकर पुनः जन्म लेना) में 'ऐसा कोई जन्तु (पैदा करनेवाला) या जीव ( पैदा होनेवाला ) नहीं है, तो आत्मा नहीं है जो मरे या मरकर पुनः जन्म ले' ऐसा; 'जन्म में कोई निमित्त ( धर्माधर्मादि ) नहीं है, मोक्ष भी अनिमित्त (तत्त्वज्ञान के बिना ही ) होता है', इसलिये 'यह मरना-जीना आदिमान् और अनन्त हैं', 'यह मरना-जीना स्वभावादिनिमित्तक तो है, पर कर्मनिमित्तक नहीं हैं', यह मरना-जीना, देह, इन्द्रिय, बुद्धि, वेदना ( हर्ष-शोकविषाद ) के उच्छेद, प्रतिसन्धान से रहित ( क्षणिक- विज्ञान-स्वरूप या शून्यरूप ) हैं' ऐसा; मोक्ष के विषय में 'समस्त कार्यों से उपरति निश्चय ही भयानक होगी, सबसे अलग इस अपवर्ग में सभी मनोरञ्जक तथा सुखकर बातें लुप्त हो जायेंगी तो कौन बुद्धिमान् सर्वसुखोच्छेद रूप मोक्ष को चाहेगा'—ऐसा ( मिथ्या ज्ञान होता है ) । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri