न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
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Read in context२८२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ०- व्यूहान्तराद् द्रव्यनिष्पत्तिः, नाभावात् । बीजावयवाः कुतश्चिन्निमित्तात् प्रादुर्भूत- क्रियाः पूर्वव्यूहं जहति व्यूहान्तरं चापद्यन्ते, व्यूहान्तरादङ्कुर उत्पद्यते । दृश्यन्ते खलु अवयवास्तत्संयोगाश्चाङ्कुरोत्पत्तिहेतवः । न चानिवृत्ते पूर्वव्यूहे बीजाव- यवानां शक्यं व्यूहान्तरेण भवितुमित्युपमर्दप्रादुर्भावयोः पौर्वापर्यनियमः क्रमः, तस्मान्नाभावाद्भावोत्पत्तिरिति । न चान्यद् बीजावयवेभ्योऽङ्कुरोत्पत्तिकारण- मित्यपपद्यते बीजोपादाननियम इति ॥ १८ ॥ ईश्वरोपादानताप्रकरणम् [ १९-२१ ] अथापर आह¹— ईश्वरः कारणम्; पुरुषकर्माफल्यदर्शनात् ॥ १९ ॥ पुरुषोऽयं समीहमानो नावश्यं समीहाफलं प्राप्नोति, तेनानुमीयते—'पराधीन पुरुषस्य कर्मफलाराधनम्' इति, यदधीनं स ईश्वरः । तस्मादीश्वरः कारण- मिति ॥ १९ ॥ सहारे हमारे मत में वही बात यों है—विकीर्णाकृतिवाले (व्याहृत रचनावाले) अवयवों की पूर्व आकृति ( रचना ) के निवृत्त होने पर दूसरी आकृति बन जाने पर द्रव्य का प्रादु- र्भाव होता है, न कि अभाव ( उन अवयवों के विनाश ) से । बीज के अवयव किसी विशेषनिमित्त से क्रियाशील होते हुए अपने पूर्व आकार को छोड़ देते हैं तथा दूसरे आका को प्राप्त कर लेते हैं । तब उस दूसरे आकार से अङ्कुर पैदा होता है । लोक में भी अव यव निमित्तविशेष के सम्पर्क से अङ्कुरोत्पत्ति के कारण होते हैं; जब तक अवयवों का पूर्वाकार निवृत्त नहीं होगा तब तक दूसरा आकार बनेगा नहीं, और वे अङ्कुरोत्पत्ति में समर्थ होंगे नहीं—अतः यह पौर्वापर्य क्रम मानना उचित ही है । इस रीति से, अभाव से भावोत्पत्तिवाला बौद्धराद्धान्त उचित नहीं; क्योंकि अङ्कुरोत्पत्ति में बीजावयवों से अतिरिक्त कोई उपादान कारण है नहीं, अतः बीजोपादाननियम उपपन्न हो जाता है ॥ १८ ॥ कुछ दार्शनिक ( वेदान्ती ) कहते हैं— पुरुष-कर्मों का बहुधा नैष्फल्य देखा जाने से ईश्वर ही इस सृष्टि का कारण है ॥१९॥ पुरुष जो कुछ समीहापूर्वक प्रयत्न करता है, हमेशा उस का किया हुआ प्रयत्न पूर्ण नहीं हुआ करता, इससे ज्ञात होता है कि पुरुष का कर्मफल पराधीन है । यह कर्म- फल जिसके अधीन है, वह ईश्वर है । अतः ईश्वर ही इस सृष्टि का कारण है ॥ १९ ॥ १. अस्मिन् प्रकरणव्याख्याने वार्त्तिकतात्पर्यकारयोर्मतवैचित्र्यमस्ति, तच्च तत्रैव टीकयोर्द्रष्टव्यम् । अस्माभिस्तु भाष्यसरणिरेव स्वीकृता ।