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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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३०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ० प्रवृत्त्यनुबन्धान्नास्त्यपवर्गः। जन्मप्रभृत्ययं यावत्प्रायणं वाग्बुद्धिशरीरा- रम्भेणाविमुक्तो गृह्यते, तत्र यदुक्तम्-‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरो- त्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः’ इति (१.१.२) तदनुपपन्नमिति ? ॥ ५९ ॥ अत्राभिधीयते— १. यत्तावदृणानुबन्धादिति, ऋणैरिव ऋणैरिति— प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देनानुवादो निन्दाप्रशंसोपपत्तेः ॥ ६० ॥ ‘ऋणैः’ इति नायं प्रधानशब्दः। यत्र खल्वेकः प्रत्यादेयं ददाति द्वितीयश्च प्रतिदेयं गृह्णाति तत्रास्य दृष्टत्वात् प्रधानमृणशब्दः! न चैतदिहोपपद्यते; प्रधानशब्दानुपपत्तेः। गुणशब्देनायमनुवादः—ऋणैरिव ऋणैरिति। प्रयुक्तोपमं चैतद्, यथाऽग्निर्मांणवक इति। अन्यत्र दृष्टश्चायमृणशब्द इह प्रयुज्यते, यथाग्नि- शब्दो मागवके। कथं गुणशब्देनानुवादः ? निन्दाप्रशंसोपपत्तेः। कर्मलोपे ऋणीव ऋणादानान्निन्द्यते, कर्मानुष्ठाने च ऋणीव ऋणदानात्प्रशस्यते; स एवोपमार्थ इति।

प्रवृत्त्यनुबन्ध से भी अपवर्ग नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त यह प्राणी वाचिक, बौद्धिक तथा शारीरिक क्रियाओं में लगा रहता है, उनसे इसे कभी छुटकारा नहीं मिल पाता। अतः आपका यह पूर्व कथन (१. १. २) कि—'दुःख जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या- ज्ञानों के उत्तरोत्तर के अपाय द्वारा उसके बाद वाले के नाश से अपवर्ग हो जाता है' ? सर्वथा अयुक्त है ॥ ५९ ॥ यहाँ सिद्धान्ती (नैयायिक) कहता है—इस ‘ऋणानुवन्ध’ शब्द में ‘ऋणों की तरह ऋणों से’ ऐसा औपचारिक अर्थ करना चाहिए। क्योंकि जहाँ शब्द का मुख्यार्थ अनुपपन्न हो वहाँ गुण शब्द से, निन्दा-प्रशंसोपपादन होने से अनुवाद कर लिया जाता है ॥ ६० ॥ ‘ऋणों से’ यह प्रधान (मुख्यार्थबोधक) शब्द नहीं है। जहाँ एक उधार ली हुई चीज को देता है तथा दूसरा लेता है—वहीं ‘ऋण’ शब्द का मुख्यार्थ रूप में प्रयोग होता है। यहाँ ऐसी बात है नहीं, अतः इस शब्द का प्रधान अर्थ गृहीत नहीं होता। इसलिये ऋणशब्द लाक्षणिक अर्थ में प्रयुक्त किया है कि ‘ऋणों की तरह के ऋणों से’। जैसे तेजस्वी आदमी को लोक में कह देते हैं—‘यह माणवक तो अग्निरूप है’। इसी तरह अन्यत्र देखा गया ऋण शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है, जैसे अग्नि शब्द माणवक में। गुण- शब्द से अनुवाद कैसे है ? उसके निन्दा-प्रशंसात्मक होने से। जैसे ऋणी ऋण न चुका पाने के कारण निन्दापात्र होता है उसी तरह यह पुरुष भी उक्त तीनों में से कोई एक या सब कर्मों के विलोप से निन्दापात्र बनता है। और जैसे ऋणी ऋण चुका देने से प्रशंसित होता है उसी तरह यह पुरुष कर्मानुष्ठान से प्रशंसा प्राप्त करता है।