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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

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९. सू० ] अवयविप्रकरणम् ३२१ कृत्स्नैकदेशावृत्तित्वादवयवानामनवयव्यभावः ? ॥ ७ ॥ एकैकोऽवयवो न तावत् कृत्स्नेऽवयविनि वर्त्तते; तयोः परिमाणभेदात्, अवय- वान्तरसम्बन्धाभावप्रसङ्गाच्च । नाप्यवयव्येकदेशेन, न ह्यस्यान्ये अवयवा एक- देशभूताः सन्तोति ? ॥ ७ ॥ अथावयवेष्वेवावयवी वर्त्तते ? तेषु चावृत्तेरवयव्यभावः ? ॥ ८ ॥ न तावत् प्रत्यवयवं वर्त्तते, तयोः परिमाणभेदाद्, द्रव्यस्य चैकद्रव्यत्वप्रसङ्गात् । नाप्येकदेशेन, सर्वेषु अन्यावयवाभावात् । तदेवं न युक्तः संशयः—नास्त्यव- यवोति ? ॥ ८ ॥ पृथक् चावयवेभ्योऽवृत्तेः ॥ ९ ॥ अवयव्यभाव इति वर्त्तते । न चायं पृथगवयवेभ्यो वर्त्तते; अग्रहणात्, नित्यत्व- प्रसंगाच्च । तस्मान्नास्त्यवयवीति ? ॥ ९ ॥ अवयवों के सम्पूर्ण या एकदेश में अवयवों के न रहने से उसकी सिद्धि नहीं होती ? ॥ ७ ॥ एक एक अवयव समग्र अवयवी में नहीं रहता; क्योंकि उन दोनों में परिमाणभेद हैं (अवयव अणुपरिमाण तथा अवयवी महापरिमाण हैं), तथा वैसी स्थिति में अवयवा- न्तर का उससे सम्बन्ध भी न बन पायेगा । और न अवयव उसके एकदेश में ही रहता है; क्योंकि अवयवों को छोड़ कर इसका कोई अन्य एकदेश नहीं है। यदि सब अवयव ही अवयवी हैं इस स्थिति में जितने अवयव हैं उतने ही अवयवी होने लगेंगे; जबकि आप अवयवी को एक मानते हैं ? ॥ ७ ॥ तो अवयवों में अवयवी रहता है—ऐसा मान लें ? उन अवयवों में अवयवी के वर्त्तमानत्व की अनुपपत्ति से अवयवी का अभाव ही है ? ॥ ८ ॥ पूर्वोक्त परिमाणभेद होने से अवयवी प्रत्येक अवयव में नहीं रह सकता; तथा एकावयववृत्ति होने से एक द्रव्य में एकसमवेत द्रव्यत्वप्रसक्ति होने लगेगी। अवयवी अपने एकदेश से प्रत्येक अवयव में नहीं रह सकता; क्योंकि सभी अवयवों में अन्य अवयव का अभाव ही है। अतः इसमें आप सन्देह क्यों कर रहे हैं कि अवयवी नहीं है ? ॥ ८ ॥ अवयव से पृथक् उसकी सत्ता न होने के कारण भी ? ॥ ९ ॥ अवयवी का अभाव ही है। अवयवी अवयवों से पृथक् नहीं हैं, क्योंकि वैसा गृहीत नहीं होता। अथ च, उसे पृथक् मानने पर उसके निराधार होने से उसमें नित्यत्व प्राप्त होगा। अतः अवयवी नहीं है—यही मान लें ? ॥ ९ ॥ न्या० दर्श० २१